बेजोड़ है भारतीय गुफा व शैलचित्र

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

भारतीय पुरातत्व की धरोहर विश्व में सर्वाधिक प्राचीन ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक समृद्ध भी है। इसका एक कारण तो यह है कि यहां की सभ्यता का प्रादुर्भाव विश्व में सबसे पहले हुआ। इसके अलावा यहां प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध थे। इसने यहां के निवासियों को कला-संस्कृति की ओर प्रेरित किया। इसके अनुरूप माहौल था।

विश्व के जिन हिस्सों में प्रकृति इतनी मेहरबान नहीं थी, वहां लोगों का जीवन कठिनाई भरा था। संसाधन बेहद कम थे। इसलिए संघर्ष की स्थिति थी। जीवन यापन पहली व मूल शर्त थी। उसके संचालन के लिए संघर्ष अपरिहार्य था। ऐसे में कल्पनाशक्ति का विकास संभव नहीं था। उनके चिंतन में ही लूट-खसोट थी। दूसरी ओर भारत में पर्याप्त जल से भरपूर नदियां थीं। विभिन्न प्रकार की ऋतुएं थीं। इससे यहां के लोगों में कल्पनाशक्ति का विकास हुआ। इसी ने शैलचित्रों, गुफाओं में चित्रों आदि का विकास हुआ।

यह आश्चर्यजनक है कि भारत के पाषाण कालीन मानव ने घरों का निर्माण बाद में किया, उन्हें सजाना व संवारना पहले सीख लिया। विश्व में ऐसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। सिर छिपाने के लिए किसी न किसी रूप में घर का निर्माण मनुष्य की आवश्यकता होती है, लेकिन उसे सजाना-संवारना कल्पनाशक्ति से ही संभव होता है। इसी क्रम में दूसरा उदाहरण भी दिलचस्प है।

गुफा व शैलचित्रों से प्रमाणित होता है कि भारत के पाषण-कालीन मानव ने घर बाद में बनाया, उसे चित्रों से सजाने की कल्पना पहले की। वैज्ञानिक शोध से उसका कालखंड प्रमाणित हो गया है। सुंदर कलाकृतियां पहले बनी हैं। एक अन्य उदाहरण भी गौरतलब है कि भारत के पाषाणकालीन मानव ने मिट्टी की कलाकृतियां पहले बनाईं, मिट्टी के बर्तन बाद बनाए।

इन सब तथ्यों से प्राचीन भारत की कला, संस्कृति और पाषाण कालीन मानव की मानसिकता का अनुमान लगाया जा सकता है। इन कला-कृतियों में प्रकृति की सुन्दरता का चित्रण किया गया। जंगली जीवों की शिकार भी चित्र है। लेकिन इसी के साथ जीवों के प्रति दायाभाव और पशुपालन के चित्रो की भरमार है। इसमें पशुओं को मानव के साथ रहते हुए दिखाया गया।

जब महौल इतना अच्छा होता है, तो गीत-संगीत का भी उदय होता है। भारतीय शैल व गुफा चित्रों मे इससे संबंधित चित्र बहुत है।

पाषाणकालीन मानव को आज की आधुनिक नजर से नहीं देखा जा सकता। ऐसा करने से वह बहुत पीछे दिखाई देते हैं। लेकिन जहां तक कला, चित्र आदि का संबंध है, पाषाणकालीन मानव को कम नहीं माना जा सकता। वरन वह आज के मुकाबले कहीं आगे दिखाई देंगे।

आज चित्रकला के क्षेत्र में संसाधनों की कमी नहीं है। एक से बढ़कर एक ब्रश, रंग, अन्य उपयोगी वस्तुएं उपलब्ध हैं, जबकि पाषाण काल में ऐसा कुछ नहीं था। चित्र के लिए वह पेड़ की डालियों का उपयोग करते थे। बाद में उन्होंने प्राकृतिक रंगों का भी निर्माण किया होगा। इसके अलावा पत्थरों की सहयता से ही गुफा चित्रों का निर्माण किया होगा। ऐसे दुर्लभ चित्रण आज भी उपलब्ध है।

कई जगह तो नीचे नदी बहती है, ऊपर पहाड़ों पर चित्र है। आश्चर्य होता है कि यहां मनुष्य किस प्रकार पहुंचा होगा। किस प्रकार उसने चित्रों का निर्माण किया होगा। कई गुफाएं ऐसी हैं, जहां आज भी गहन अंधकार रहता है। वहां बिना रोशनी के पहुंचना या कुछ देखना संभव नहीं होता। वहां बेहद आकर्षक चित्र हजारों वर्ष पहले बनाए गए। जो गुफा जितनी प्राचीन होती है, उसके रहस्य को समझना उतना ही कठिन होता है। इससे उस समय के लोगो की जीवन संबंधी विशेषताओं का अनुमान लगाया जा सकता है। विश्व के अन्य हिस्सों में जो गुफाचित्र मिलते हैं, उसमें सर्वाधिक शिकार संबंधी चित्र हैं।

प्रकति ने जंगली पशुओं को ज्यादा शक्तिशाली बनाया। लेकिन मनुष्य ने अपना पेट भरने के लिए उनका शिकार किया। उनके सर्वाधिक अनुभव शिकार से ही संबंधित थे। इसलिए गुफा चित्रों में सर्वाधिक ऐसे ही चित्रों को उकेरा गया। फिर भी यह मानना होगा कि पाषाणकालीन मानव ने अपने क्रिया कलापों को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

पुरातत्व में लोकजीवन की झलक मिलती है। इसमें समरसता व सामाजिक जीवन है। ये सभी कलाकृतियां बड़ा संदेश देती है। पर्यटन की दृष्टि से इनका बहुत महत्व है। इन्हें बढ़ाने की जरूरत है। (आईएएनएस/आईपीएन)

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