श्रद्धा और आस्था का प्रतिफल ही होता है कि दुनिया के हर कोने से भक्त अपने आराध्य देव के आशीर्वाद के लिए आते हैं तथा उसके दर पर नतमस्तक हो जाते हैं। भिवानी जिले के गांव इमलोटा में स्थित लालूवाला धाम के नाम से प्रसिद्ध महाशिव रूद्र बाबा धजाधारी मंदिर भी प्रख्यात संत के आशीर्वाद और कृपा के फलस्वरूप निर्मित मंदिर है जो आज से लगभग एक सदी पहले गांव के सेठ भगवाना ने बनवाया था।
माना जाता है कि स्वयं बाबा धजाधारी ने इसी स्थान पर सेठ भगवाना को साक्षात दर्शन देकर यहां महाशिव रूद्र बाबा धजाधारी का मंदिर बनवाने पर मनोकामनाएं पूर्ण होने के लिए कहा था। सेठ ने बाबा की बात मान ली और मंदिर निर्माण ही नहीं बल्कि आजीवन बाबा की पूजा करने की बात मन में ठान ली। बुजुर्ग श्रद्धालु मानते हैं कि यहां कोई न कोई ऐसा संत-महात्मा हुआ है जो या तो लोक कल्याण के लिए ध्वजा लेकर चलता होगा या जिसके तप की ध्वजा यानी कीर्ति दूर-दूर तक फहराती होगी। चाहे जो हो सेठ भगवाना के वंशज और गांव के लोग आज भी मानते हैं कि जिस संत ने सेठ भगवाना को दर्शन दिए थे वह स्वयं महाशिव रूद्र बाबा ध्वजाधारी उर्फ धजाधारी ही थे।
श्रद्धालुओं का मानना है कि इस धार्मिक स्थल को पहले लाला वाला धाम कहकर पुकारा जाता था जो कालांतर में लालूवाला धाम के नाम से विख्यात हुआ। इस मंदिर के निर्माता सेठ भगवाना को बाबा का भक्त होने के कारण सेठ भगवाना दास भी कहा जाता है। उन्होंने अपनी नेक कमाई से यहां बाबा धजाधारी मंदिर का निर्माण करवाया और आजीवन इस मंदिर में पुजारी के रूप में सेवा की। धीरे-धीरे इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। श्रद्धालु मानते हैं कि लालूवाला धाम के बाबा धजाधारी ही उनके संकटों को हरते हैं और उन्हें सुखमय जीवन प्रदान करते हैं। इस धाम पर हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या और माघ मास की पूर्णिमा के दिन विशाल मेला लगता है। यहां गद्दीनशीन संत द्वारा ज्येष्ठ मास में 84 से 108 धूनियों के बीच नियमित तपस्या, और माघ माह में एक महीने तक हर रोज सवा घंटे तक शीतल जलधारा से स्नान किया जाता है।
वर्तमान में इस मंदिर में भगवाना दास के पड़पौत्र गृहस्थ संत हेमराज दास के शिष्य राकेश दास यह तपस्या और साधना हर साल करते हैं। इस समय मंदिर में एक विशाल धर्मशाला के अलावा एक विशाल सत्संग भवन भी बनाया गया है। मंदिर का निर्माण कार्य भगवाना दास के वंशज ही करते आ रहे हैं। यहीं पर बाबा गोरखनाथ मंदिर, शिव मंदिर और समाधि आदि का निर्माण भी भगवाना के वंशजों द्वारा करवाया गया है।
मंदिर के निर्माण कार्य की देखरेख हेमराज दास करते हैं तथा इमलोटा गांव के ही दूसरे परिवार से संबंधित उनके शिष्य राकेश दास भी हाथ बंटाते हैं। गुरु-शिष्य द्वारा विभिन्न जड़ी-बूटियों से निर्मित आंखों व पथरी की दवा भी निशुल्क दी जाती है। समाधि के बारे में कहा जाता है कि यह बाबा धजाधारी की समाधि है जहां बाबा समाए हुए हैं। मंदिर परिसर को नीम, पीपल, शीशम, शहतूत और वटवृक्ष आदि रमणीक बनाते हैं। यहां पर हर समुदाय के लोग पूजा-पाठ करने आते हैं।
ग्रामीण श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां आकर जो भी श्रद्धा से शीश झुकाता है बाबा उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं। शिवरात्रि पर यहां अनेक शिवभक्त हरिद्वार से कांवड़ लाकर चढ़ाते हैं। गांव के ही श्रद्धालु व गीतकार महेंद्र सिंह बिलोटिया ने बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा गीतों के माध्यम से प्रकट की है। ‘बाबा धजाधारी की महिमा’ नाम से उनके आठ गीतों की एक एलबम लोक गायक मास्टर दुलीचंद की आवाज में कुछ दिन पूर्व ही रिलीज हुई है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि गांव इमलोटा के लालूवाला धाम के रूप में महाशिव रूद्र बाबा धजाधारी की महिमा सबसे न्यारी है। यही कारण है कि यहां पर दूर-दूर से आने वाले महाशिव रूद्र बाबा धजाधारी के भक्तों का तांता लगा रहता है।
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