भारत में धार्मिक शत्रुता उच्च स्तर पर : प्यू स्टडी

वाशिंगटन, 27 फरवरी (आईएएनएस)। भारत में धर्म से जुड़ी शत्रुता आम हो बात हो चुकी है। यहां धर्म, जाति को लेकर झगड़ों की खबरें आए दिन आती हैं। एक नए अध्ययन की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में धर्म से जुड़ी सामाजिक शत्रुता उच्च स्तर पर है, जबकि चीन में धार्मिक मान्यताओं को कर्मकांडों पर सरकारी प्रतिबंधों का स्तर सबसे अधिक है।

यहां गुरुवार को जारी प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा धर्म पर वैश्विक प्रतिबंध विषय पर हुए अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में वर्ष 2013 में सार्वभौमिक तौर पर धर्म संबंधी सामाजिक शत्रुता का प्रतिशत कुछ कम हुआ है।

हालांकि रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया के एक तिहाई देश अभी भी उच्च स्तर की धार्मिक शत्रुता से जूझ रहे हैं।

अध्ययन में पाया गया कि 39 प्रतिशत देशों में सामाजिक शत्रुता उच्च स्तर पर है, चाहें वह सरकारी नीतियों का परिणाम हो याह निजी लोगों, संगठनों यासामाजिक समूहों के शत्रुतापूर्ण कार्यो के कारण हो।

ऐसा इसलिए है क्योंकि इनमें कुछ (चीन और भारत) जैसे देश अधिक जनसंख्या वाले देश हैं, जहां वर्ष 2013 में धर्म पर प्रतिबंध उच्च स्तर पर रहा।

हालांकि, वर्ष 2013 में उच्च स्तर के समाजिक शत्रुता वाले देशों और प्रदेशों की संख्या घटकर 17 हो गई। वर्ष 2012 में यह संख्या 20 थी।

इजराइल, भारत, पाकिस्तान, फिलिस्तीन, और नाइजीरिया सहित इस श्रेणी में आने वाले अधिकतर देशों में सामाजिक शत्रुता पहले से ही उच्च स्तर पर है।

वर्ष 2013 उन देशों की संख्या में कमी आई हैं, जहां हिंदुओं का शोषण होता है। वर्ष 2012 में यह संख्या 16 थी, जबकि 2013 में यह संख्या घटकर नौ हो गई।

अधिकांश देशों में दुनिया के दो सबसे बड़े धार्मिक समूहों-ईसाइयों और मुस्लिमों का शोषण जारी है। ये दोनों समूह मिलकर दुनिया की आधी से अधिक आबादी बनाते हैं।

अध्ययन में पाया गया कि यहूदी और लोक धर्मो के अनुयायियों का शोषण होने वाले देशों में इजाफा हुआ है।

दुनिया के 25 सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में म्यांमार, मिस्र, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और रूस में सबसे ज्यादा प्रतिबंध पाए गए। इन देशों में सरकार और समाज दोनों की तरफ से धार्मिक मान्यताओं और कर्मकांडों पर बड़े प्रतिबंध लागू हैं।

अध्ययन की रिपोर्ट में बताया गया कि धर्म से जुड़ी सामाजिक शत्रुता के उच्च स्तर वाले देशों में भी कमी आई है। वर्ष 2012 ऐसे 33 प्रतिशत देश थे, जबकि 2013 में ऐसे 27 प्रतिशत देश रह गए हैं।

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