इस साल देश के केवल तीन प्रतिशत कुओं के जलस्तर में मुश्किल से चार मीटर से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
इस साल देश के केवल तीन प्रतिशत कुओं के जलस्तर में मुश्किल से चार मीटर से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
केंद्रीय भू-जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की एक रपट के मुताबिक, इस दौरान केवल 35 प्रतिशत कुओं के जलस्तर में ही किसी तरह की वृद्धि दिखी। अर्थात 64 प्रतिशत कुओं के जलस्तर में गिरावट हुई। साल 2016 की जनवरी में औसत जलस्तर साल 2006 से 2015 के बीच के औसत जलस्तर से कम था।
भारत में गिरते जलस्तर की प्रवृत्ति के पीछे भू-जल के वार्षिक दोहन की दर 251 क्यूबिक किलोमीटर (सीयू केएम) है जो भाखड़ा बांध में संग्रहीत जल से 26 गुणा अधिक है। नतीजा है कि देश दुनिया का सबसे बड़ा भू-जल उपभोक्ता बन गया है।
साल 2012 की यूनेस्को की एक रपट के मुताबिक, 112 क्यूबिक किलोमीटर वार्षिक भू-जल दोहन दर के साथ चीन और अमेरिका बड़े अंतर के साथ संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर हैं।
सीजीडब्ल्यूबी की ओर से जारी साल 2014-15 की ग्राउंड वाटर ईयर बुक के मुताबिक, भारत में करीब 90 प्रतिशत भू-जल सिंचाई के लिए इस्तेमाल होता है, जो सिंचाई की भू-जल पर निर्भरता को दर्शाता है। यह करीब 60 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र को जल उपलब्ध कराता है।
जोधपुर स्थित एक गैर लाभकारी संस्था जल भागीरथी फाउंडेशन ने कुओं को फिर से भरने की एक परियोजना शुरू की। इस परियोजना ने थुम्बो के गोलिया गांव के महावीर सिंह को अरंडी की खेती की जगह मिर्च, सब्जियां और बाद में बेरी की खेती करने में सक्षम बनाया और उनकी आय 40 प्रतिशत बढ़ गई और बेरी की फसल अच्छी होने पर वह आय में 250 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद करते हैं।
सिंह ने इंडिया स्पेंड को फोन पर बताया, “अब गर्मी में भी मेरे कुआं का जलस्तर समान रहता है।”
उन्होंने कुएं के जल की गुणवत्ता में सुधार की बात करते हुए कहा, “अब कुएं का पानी मीठा है जो पहले नमकीन था।”
ठीक इसके विपरीत ऐसी स्थिति बन रही है जिसमें पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के औसत किसान के लिए साल 2025 तक सिंचाई के लिए भू-जल नहीं बचेगा।
भू-जल की दिक्कत और इसी के साथ लाभ भी इसकी विकेंद्रीकृत उपलब्धता है। लोगों को उनकी जमीन पर कुआं खोदने और जल निकालने के लिए एक लाइसेंस भर की जरूरत पड़ती है।
एक अनुमान के मुताबिक, भारत में भू-जल दोहन के लिए 3 करोड़ ढांचे बने हुए हैं।
पंजाब, राजस्थान और हरियाणा में बारिश से भू-जल के फिर से भरने से कहीं अधिक इसका दोहन होता है।
जल पुरुष के रूप में मशहूर राजस्थान में अलवर के राजेंद्र सिंह ने कहा कि लाइसेंस भू-जल का दोहन तो नहीं ही रोकता है, बदले में व्यवस्था के अंदर भ्रष्टाचार अलग बढ़ाता है।
इस साल जुलाई में जारी सरकारी रपट में कहा गया, “हम लाइसेंस-कोटा परमिट राज के जरिए 3 करोड़ भू-जल ढांचों की निगरानी नहीं कर सकते हैं। इसकी जगह भू-जल को सामुदायिक संसाधन माना जाए न कि जमीन मालिक का एक निजी संसाधन।”
स्थानीय लोग जल के उपयोग की निगरानी के लिए अच्छी स्थिति में हैं और संभवत: इस काम को वे ईमादारीपूर्वक करेंगे, क्योंकि उनका जीवन इसकी उपलब्धता पर निर्भर है। राजेंद्र सिंह ने कहा कि यह 100 साल पहले की ही बात है जब देश में जल का इस्तेमाल लोगों का समुदाय विकेंद्रीकृत रूप से करता था। यह तो कथित आधुनिक विकास है जिसने बहुत कुछ बदल दिया।
(आंकड़ा आधारित, गैर परोपकारी, लोकहित पत्रकारिता मंच, इंडियास्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत। यह इंडियास्पेंड का निजी विचार है।)
dharmpath.com dharmpath