मप्र चुनाव में ‘उम्मीदवारी’ सवालों के घेरे में

भोपाल, 8 नवंबर (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश में सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी हो या विपक्षी कांग्रेस, दोनों ही दलों में कई नेताओं की उम्मीदवारी सवालों के घेरे में है। टिकट बेचे जाने तक के आरोप लग रहे हैं। अनजान चेहरों को उम्मीदवार बनाए जाने से इन आरोपों को वजन भी मिल रहा है।

भोपाल, 8 नवंबर (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश में सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी हो या विपक्षी कांग्रेस, दोनों ही दलों में कई नेताओं की उम्मीदवारी सवालों के घेरे में है। टिकट बेचे जाने तक के आरोप लग रहे हैं। अनजान चेहरों को उम्मीदवार बनाए जाने से इन आरोपों को वजन भी मिल रहा है।

टीकमगढ़ से भाजपा के विधायक रहे के.के. श्रीवास्तव का टिकट काटे जाने पर उन्होंने सीधे तौर पर पार्टी पर टिकट बेचने का आरोप लगा दिया। उन्होंने साफ कहा कि पार्टी हमेशा बात सर्वे और दावेदार के काम की बात करती रही, मगर पूरे जिले में टिकट बेचे गए। उन्होंने पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी पर दो से चार करोड़ रुपये लेकर टिकट बेचने का सीधा आरोप लगाया।

इसी तरह सागर जिले के पूर्व शहर कांग्रेस अध्यक्ष जगदीश यादव ने पार्टी पर जोरदार हमला बोला है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति दो बार चुनाव हारता है, वह पार्टी की प्रदेश इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बन जाता है और पार्टी उसे फिर उम्मीदवार बना देती है। इतना ही नहीं, जो दो चुनाव हारकर सागर छोड़कर भोपाल भाग जाते हैं, वे प्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष बन जाते हैं। कांग्रेस में चुनाव हारना योग्यता बन गया है। कांग्रेस में दशकों से काम करने वालों की उपेक्षा हो रही है।

भाजपा ने बुंदेलखंड, चंबल और मालवा अंचल में ऐसे लेागों को उम्मीदवार बना दिया है, जो न तो पैनल में थे और न ही जिनको पार्टी का समर्थन हासिल है। यही कारण है कि, हर तरफ विरोध के स्वर गूंज रहे हैं। वहीं तमाम नेताओं द्वारा खुले और दबे स्वर में टिकट बेचे जाने की बात कही जा रही है।

दूसरी ओर, कांग्रेस भी इन्हीं हालात से गुजर रही है। बुंदेलखंड क्षेत्र में तो उत्तर प्रदेश से नाता रखने वालों पर दांव लगाया जा रहा है। विंध्य में अनजान लोगों को भी मैदान में उतार दिया गया है। मालवा क्षेत्र का भी यही हाल है।

राहुल गांधी ने तमाम वादे किए कि सर्वे होंगे, पैराशूट को टिकट नहीं देंगे, उसके बाद भी कई नेताओं ने टेबल के नीचे से सौदाकर ऐसे लोगों को उम्मीदवार बना दिया है, जो आने वाले दिनों में पार्टी के लिए नई मुसीबत बनेंगे, इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

कांग्रेस के एक नेता ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा कि पार्टी के जिस नेता को प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है, उसके पास जब भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन का प्रभार था, तब उसने पदों का वितरण किस तरह से किया था, यह किसी से छुपा नहीं है। अब तो राज्य के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण की बात है तो क्या-क्या किया होगा, कहना आसान नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषक भारत शर्मा का कहना है कि राजनीतिक दलों के लिए चुनाव लड़ने और नेताओं की सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए फंड की जरूरत होती है। भाजपा सत्ता में है, इसलिए उसे इसकी ज्यादा जरूरत नहीं है, मगर कांग्रेस को फंड आसानी से नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा, वह सक्षम व्यक्ति को उम्मीदवार बनाकर फंड का इंतजाम करती है। इसी बात का कई नेता लाभ उठा लेते हैं। पार्टी तक कुछ हिस्सा ही पहुंचता है और ज्यादा हिस्सा नेताओं की जेब में चला जाता है।

उन्होंने कहा कि भाजपा में भी कई नेता लाभ उठाने से नहीं चूकते। यही कारण है कि ऐसे अनजान चेहरे, जो धनबली होते हैं, टिकट पा जाते हैं।

शर्मा ने आगे कहा कि बसपा और सपा में टिकट खरीदना आमचर्चा में रहा है। इन दलों में तो ऐन मौके पर भी टिकट बदल दिए जाते हैं। साथ ही आरोप भी लगते हैं कि फलां टिकट इतने में बिका। अब यही परंपरा कांग्रेस और भाजपा में भी घर कर रही है।

राज्य में भाजपा और कांग्रेस अभी तक पूरे 230 विधानसभा क्षेत्रों के उम्मीदवारों का अंतिम फैसला नहीं कर पाई है। दोनों ही दलों में सस्साकशी जारी है। एक तरफ जहां परिवारवाद हावी है तो दूसरी ओर गुटबाजी भी साफ नजर आ रही है। देखना होगा कि वास्तव में कितने कर्मठ कार्यकर्ता टिकट से वंचित रहते हैं और अनजान चेहरे उम्मीदवार बना दिए जाते हैं।

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