मप्र में कांग्रेस फिर बढ़ रही बड़ी चूक की तरफ ?

भोपाल, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। अभी न तो मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव जल्दी होने वाले हैं, न ही कांग्रेस के पक्ष में कोई लहर है, फिर भी दावेदारी के लिए हाय-तौबा मची हुई है, ठीक लगभग वैसा ही हाल है ‘सूत न कपास और जुलाहों में लट्ठमलठ’। अंदेशा इस बात का होने लगा है कि यह स्थितियां कहीं कांग्रेस को बड़ी चूक की ओर तो नहीं ले जा रही हैं!

भोपाल, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। अभी न तो मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव जल्दी होने वाले हैं, न ही कांग्रेस के पक्ष में कोई लहर है, फिर भी दावेदारी के लिए हाय-तौबा मची हुई है, ठीक लगभग वैसा ही हाल है ‘सूत न कपास और जुलाहों में लट्ठमलठ’। अंदेशा इस बात का होने लगा है कि यह स्थितियां कहीं कांग्रेस को बड़ी चूक की ओर तो नहीं ले जा रही हैं!

राज्य की सत्ता से कांग्रेस पिछले 15 वर्षो से बाहर है, मगर उसके भीतर चलने वाली वर्चस्व की लड़ाई अब भी खत्म नहीं हुई है। नेता लाख कहें कि गुटबाजी नहीं है, मगर क्षत्रप एक-दूसरे की ओर बढ़कर गले मिलने को तैयार नहीं हैं। यह बात अलग है कि कभी-कभार गुटों के मुखिया एक मंच पर आकर यह बताने की कोशिश करते हैं कि वे सब एक हैं।

बात 2013 के विधानसभा चुनाव की करें, तो समझ में आता है कि चुनाव से पहले राज्य के क्षत्रपों दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किस तरह पार्टी की जीत की बजाय अपने समर्थकों को टिकट दिलाने में दिलचस्पी दिखाई थी। यही कारण था कि कांग्रेस चुनाव में वैसे नतीजे नहीं पा सकी जैसी उम्मीद राज्य के लोग कर रहे थे।

आगामी विधानसभा चुनाव में लगभग एक साल का वक्त है, यह बात सही है कि राज्य में सरकार की नीतियों के खिलाफ एक बड़े वर्ग में रोष है। ऐसे में कांग्रेस नेताओं को लगने लगा है कि सत्ता उनके हाथ आ सकती है। बस इसी उम्मीद के चलते नेताओं ने अपने मनमाफिक समीकरण बनाना शुरू कर दिए हैं। सबसे पहले उन्होंने मिलकर प्रदेश प्रभारी मोहन प्रकाश की छुट्टी करा दी।

प्रदेश के प्रभारी रहे मोहन प्रकाश बड़े नेताओं को ज्यादा महत्व देने की बजाय निचले स्तर यानी जिला व ब्लॉक स्तर पर जाकर काम कर रहे थे। प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के साथ उनका बेहतर तालमेल था, उन्होंने लगभग पूरे प्रदेश का दौरा किया, प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, क्योंकि उनकी नजर में जमीनी स्तर पर तैयारी ज्यादा जरूरी थी। यह बात नेताओं को रास कम आ रही थी, लिहाजा सभी ने लामबंद होकर मोहन प्रकाश को प्रदेश प्रभारी पद से हटवा दिया।

यह पहली बड़ी चूक मानी जा रही है, क्योंकि कांग्रेस की सियासत में वे पहले ऐसे प्रदेश प्रभारी रहे, जिन्होंने सीधे कार्यकर्ताओं से संवाद किया और बीते लगभग छह सालों में राज्य की राजनीति को करीब से समझा। इतना ही नहीं, उनका किसी गुट से नाता नहीं था।

कांग्रेस सूत्रों की मानें तो बड़े नेताओं को लग रहा था कि मोहन प्रकाश प्रभारी रहे तो उनके चहेतों को आसानी से विधानसभा का टिकट नहीं मिल पाएगा, क्योंकि पिछले चुनाव में मोहन प्रकाश ने उन उम्मीदवारों की पैरवी की थी, जो भाजपा को टक्कर देने में सक्षम थे। इसके चलते प्रकाश की कई नेताओं से अनबन भी हुई थी। लिहाजा, इस बार ऐसा न हो, इसी के चलते चुनाव से पहले ही मोहन प्रकाश की छुट्टी करा दी।

वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया का कहना है, “देश में कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही दलों में पक्षांतरण यानी पुराने नेतृत्व की विदाई और नए नेतृत्व के हाथ में कमान सौंपने का दौर चल रहा है, कांग्रेस में राहुल गांधी राज्य में नेतृत्व थोपना नहीं चाहते, बल्कि निर्वाचन के जरिए अपनी पसंद के व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपना चाहते हैं। प्रदेश में 65 प्रतिशत युवा मतदाता हैं, उसे ध्यान में रखकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी चेहरे के तौर पर पेश कर सकती है। जहां तक मोहन प्रकाश को हटाने की बात है, उन्हें पार्टी के लिए जो करना था वे कर गए।”

राजनीति के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को अगर किसी को चेहरे के तौर पर पेश करना है तो जल्दी ऐलान कर देना चाहिए, देर हुई तो पार्टी के लिए चेहरा घोषित करना मुसीबत बन जाएगा। अब देखिए न, कमलनाथ ने सिंधिया का नाम लिया तो दिग्विजय सिंह ने कह दिया कि नाम तो हाईकमान तय करेगा।

कांग्रेस के भीतर क्या स्थिति है, इतने में पता चल जाती है। दूसरी तरफ प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव को हटाने की चर्चाओं से भी पार्टी की गतिविधियां प्रभावित हो रही है। आने वाले दिन कांग्रेस के लिए अहम हैं, क्योंकि नए नेतृत्व संबंधी फैसले को पार्टी के नेताओं ने ही चुनौती देना शुरू कर दिया तो कांग्रेस और कमजोर होगी। भाजपा तो इसी के इंतजार में है।

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