महिलाओं की हिफाजत की शपथ लें : प्रणब

नई दिल्ली, 25 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रविवार को यहां कहा कि हर एक भारतीय को किसी भी प्रकार की हिंसा से महिलाओं की हिफाजत करने की शपथ लेनी चाहिए।

नई दिल्ली, 25 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने रविवार को यहां कहा कि हर एक भारतीय को किसी भी प्रकार की हिंसा से महिलाओं की हिफाजत करने की शपथ लेनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल ऐसा ही देश वैश्विक शक्ति बन सकता है जो अपनी महिलाओं का सम्मान करे तथा उन्हें सशक्त बनाए।

राष्ट्रपति ने 66वें गणतंत्र की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि दुष्कर्म, हत्या, सड़कों पर छेड़छाड़, अपहरण तथा दहेज हत्याओं जैसे अत्याचारों ने महिलाओं के मन में अपने घरों में भी भय पैदा कर दिया है।

उन्होंने कहा कि यह देखकर दु:ख होता है कि जब महिलाओं की हिफाजत की बात होती है तब उसके अपने बच्चों द्वारा ही भारत माता का सम्मान नहीं किया जाता।

राष्ट्रपति ने कहा, “रवीन्द्रनाथ टैगोर महिलाओं को न केवल घर में प्रकाश करने वाली देवियां मानते थे वरन उन्हें स्वयं आत्मा का प्रकाश मानते थे। माता-पिता, शिक्षकों और नेताओं के रूप में, हमसे कहां चूक हो गई है कि हमारे बच्चे सभ्य व्यवहार तथा महिलाओं के प्रति सम्मान के सिद्धांतों को भूल गए हैं।”

उन्होंने कहा कि हमने बहुत से कानून बनाए हैं, परंतु जैसा कि बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक बार कहा था, “न्याय का उद्देश्य तब तक पूर्ण नहीं होगा जब तक कि वे लोग भी उतने ही क्षुब्ध नहीं महसूस करते जो भुक्तभोगी नहीं हैं जितना कि वे, जो भुक्तभोगी हैं।”

राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय संविधान लोकतंत्र की पवित्र पुस्तक है। उन्होंने कहा, “यह ऐसे भारत के सामाजिक-आर्थिक बदलाव का पथप्रदर्शक है, जिसने प्राचीन काल से ही बहुलता का सम्मान किया है, सहनशीलता का पक्ष लिया है तथा विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दिया है। परंतु इन मूल्यों की हिफाजत अत्यधिक सावधानी और मुस्तैदी से करने की जरूरत है।”

राष्ट्रपति ने कहा, “लोकतंत्र में निहित स्वतंत्रता कभी-कभी उन्मादपूर्ण प्रतिस्पर्धा के रूप में एक ऐसा नया कष्टप्रद परिणाम सामने ले आती है जो हमारी परंपरागत प्रकृति के विरुद्ध है। वाणी की हिंसा चोट पहुंचाती है और लोगों के दिलों को घायल करती है। गांधी जी ने कहा था कि धर्म एकता की ताकत है; हम इसे टकराव का कारण नहीं बना सकते।”

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सौम्य शक्ति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, परंतु इस तरह के अंतरराष्ट्रीय परिवेश में, जहां बहुत से देश धर्म आधारित हिंसा के दलदल में फंसते जा रहे हैं, भारत की सौम्य शक्ति का सबसे शक्तिशाली उदाहरण धर्म एवं राज-व्यवस्था के बीच संबंधों की हमारी परिभाषा में निहित है।

उन्होंने कहा, “हमने सदैव धार्मिक समानता पर अपना भरोसा जताया है, जहां हर धर्म कानून के सामने बराबर हैं तथा प्रत्येक संस्कृति दूसरे में मिलकर एक सकारात्मक गतिशीलता की रचना करती है। भारत की प्रज्ञा हमें सिखाती है : एकता ताकत है, प्रभुता कमजोरी है।”

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