आज से 15 साल पहले उनकी परिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके वालिद हफीज अहमद का कारोबार बिल्कुल ठप हो गया था। तब पिता ने अपने 6 बेटों में से 5वें नंबर के शादाब को कव्वाली सिखाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे बेटे की कव्वाली से कमाए पैसों से घर चलने लगा।
शादाब अपनी आर्थिक तंगी के दौर में कच्चे मकान में रहते थे, जिसकी छत बारिश के दिनों में टपककर घर में भी उतना ही पानी भर देती थी, जितना बाहर पानी होता था, पर आज वह अच्छा कमा लेते हैं। उनका घर पक्का और आधुनिक सुविधाओं से लैस हो चुका है।
उनके परिवार में कव्वाली गाने का काम दादा के जमाने से चला आ रहा है, जो उनके वालिद के बाद वह कर रहे हैं। पतली कदकठी के आधुनिक से देखने वाले शादाब कव्वाली के मंच पर पूरे मंजे हुए कव्वाल लगते हैं। शादाब को अपने परिवार से इस कला को जीवित रखने के लिए बहुत सहयोग और प्यार मिलता है।
शादाब कव्वाली के अब तक के सफर में आने वाली चुनौती के बारे में बताते हैं, “अपने सीनियर कलाकारों के सामने मैं थोड़ा सा घबरा जाता हूं। पर मेरा उसूल है कि मैं जब तक वजू नहीं कर लेता हूं, तब तक मैं महफिल में नहीं बैठा हूं। वजू करने के साथ ही मैं अपनी अम्मी को फोन करके बताता हूं कि मैं महफिल में जा रहा हूं। अल्लाह और अम्मी की दुआ से मैं अब तक की सारी चुनौतियों को जीतकर आया हूं।”
dharmpath.com dharmpath