यदुवंशी पुराणे अथ अमरकथा

देवलोक में देवर्षि खुद का अभूतपूर्व सत्कार देख अति प्रसन्न हुए। छिद्रान्वेषी स्वभाव के चलते वह इस बात को पचा नहीं पा रहे थे। उनमें पितामह ब्रह्मा से इसका कारण जानने की उत्सुकता प्रगट हुई। बोले, “हे पितामह, हम देवलोक के इस सत्कार से बेहद अभिभूत हूं। क्या मैं इसका कारण जान सकता हूं।”

देवलोक में देवर्षि खुद का अभूतपूर्व सत्कार देख अति प्रसन्न हुए। छिद्रान्वेषी स्वभाव के चलते वह इस बात को पचा नहीं पा रहे थे। उनमें पितामह ब्रह्मा से इसका कारण जानने की उत्सुकता प्रगट हुई। बोले, “हे पितामह, हम देवलोक के इस सत्कार से बेहद अभिभूत हूं। क्या मैं इसका कारण जान सकता हूं।”

बोले, पुत्र धरती लोक से तुम पत्रकारिता धर्म निभाकर हाल में लौटे हो। आपने बिहार चुनाव और नीतीश शपथ ग्रहण की तथ्यात्मक रिपोर्टिग कर देवलोक के पाठकों को आनंदित किया है।

आपने देवलोकवासियों को धरती लोक में राजनीतिक धर्म निभाने वाले प्राणियों की एक-एक विशेषताओं से परिचित कराया है। इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं, क्योंकि बिहार के बाद राजनीतिक लिहाज से उत्तर भारत के सबसे बड़े राज्य यूपी में भी अब चुनावी खिचड़ी पकने लगी है।

लिहाजा, देवलोक आपसे बिहार जैसी तथ्यात्मक रपट की अपेक्षा रखता है। अब तो आप इस सत्कार के पीछे का राज समझ गए होंगे। मीडिया गुरु देवर्षि नारद ने ब्रह्मा के सामने सिर झुकाते हुए कहा “हे नाथ! आपकी लीला न्यारी है। आप धन्य हैं। आप की रचनाधर्मिता को कोई चुनौती नहीं देसकता है। आपका न्याय अनन्य और सर्वप्रिय है।

..प्रभो धरती के प्राणियों की लीला सबसे निराली है। उसमें भी राजनीति की लीला सबसे अलग। यहां सभी धार्मों में श्रेष्ठ राजनीति है। यह सर्व और लोकप्रिय है। यह अवसरवाद, जाति, धर्म, नीति, धर्म, अधर्म, पंथ, से परे है। इसकी अपनी कोई भाषा और परिभाषा नहीं है। धरती लोक के राजनीतिक प्राणियों का धर्म अकथनीय और अवर्णनीय के साथ अद्वितीय है। इसका न आदि है न अंत। प्रभो! राजनीतिक प्राणी गोमुख और गायत्री से भी पवित्र होते हैं।”

आपने देखा बिहार में किस तरह क्या हुआ। धर्म, पंथ, जाति का भांडा फूटा। चुनाव पटने में हो रहे थे और पटाखे पाकिस्तान में फूट रहे थे। यह राजनीति है। इसमें नीति नहीं होती है।

राजनीति में गाली के बाद गले मिलन सबसे पवित्र माना जाता है, जैसे अपने केजरी भइया ने किया। धरती लोक में कल तक जो एक-दूसरे को नीचा दिखाते रहे थे, एक दूजे को असहिष्णु बताते रहे वे पवित्र चुनावी मौसम में किस तरह आ बैल मुझे मार की तर्ज पर आ गले लग गए। धरती की माया धन्य है प्रभो। राजनीतिक धर्मावलबिंयों की माया मायापति से भी बड़ी और निराली है। शपथ ग्रहण समारोह में आपने नहीं देखा।

मानो यह शपथ ग्रहण के बजाय सर्वधर्मसमभाव सम्मेलन रहा। जाति, धर्म, बोल, वचन सबको भूला मनसा, वाचा कर्मणा से सब एक स्वर में भारत विजय का संकल्प लेते दिखे। हालांकि भारत में इस तरह का राजनीतिक गठबंधन चिरजीवी नहीं रहा है, लेकिन उसे पुनजीवित करने की कोशिश राजनीति धर्मावलंबी समय-समय पर करते रहते हैं।

बिहार चुनाव न होकर गोया यह बहार के दिन थे। अब अपने यूपी वाले यदुवंशी दिल से मुलायम और ठाकुर साहब को देखिए। उनकी यारी पटरी पर आती दिखती है। लेकिन खां साहब बेवजह कबाब में हड्डी और तूफान बने हैं।

कहते फिर रहे हैं कि तूफान आता है तो कूड़ा करकट भी चला आता है। अब कौन उन्हें समझाए। ऐसी बात भी नहीं हैं कि वे समझते भी नहीं हैं। अरे भाई अब मुलायम सिंह बेचारे क्या करते। जनम-जनम का साथ रहा है। सैफई की आबोहवा में आज जो रंग घुला है। उसमें क्या अपने ठाकुर साहब की भूमिका कम रही है।

बेचारे नेताजी ठहरे मुलायम दिल लिहाजा अपने जन्मदिन का जश्न उन्हें दो जगह मनाना पड़ा। एक अपने ठाकुर भइया के लिए दूसरे अपने रामपुरवाले अजीज के लिए। कृष्ण और गोपियों की तरह सभी के पास होने का उन्होंने अहसास कराया, क्योंकि यदुवंशी को 2017 के महासमर के पहले किसी दूसरे महासंग्राम की शुरूवात उनकी सेहत के लिए अच्छी नहीं होगी। इसलिए उन्हें पांचजन्य का उपयोग करना पड़ा। यानी अवस्थामा मरो नरो वा कुंजरो..।

लिहाजा, वे ‘अमर प्रेम’ को जाहिर करने में कामयाब दिखे और अपने अपने खां साहब की रामपुरी छूरी से केक काट कर उन्हें अपना होने का एहसास भी करा दिया।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन के दो सारथी थे एक मधुसूदन और दूसरे बजरंगबली। ठीक वैसे ही राजनीति के रणक्षेत्र में मुलामय सिंह के भी दो सारथी हैं अपने आजमगढ़ वाले बाबू साहब और रामपुरी छूरी की धारवाले खां साहब। नेताजी के दिल में आज भी दिल के अरमां आसुंओं में बह गए हम वफा करके भी तनहा रह गए की छबि ठाकर साहब की है।

अमर भइया की वफादारी को मुलायम दिल नेताजी कभी नहीं भूल सकते हैं। लिहाजा, कृष्णरुपी सारथी की अमरकथा और उसके प्रेम को वे कैसे भूल सकते हैं, क्योंकि अर्जुन के सच्चे सारथी मधुसूदन ही थे।

लिहाजा, उन्हें जन्मदिन का जश्न सैफई में आयोजित करना पड़ा, क्योंकि उन्हें अपने गांव को बड़ा आयोजन दिखाना था और खां साहब की ‘रामपुरीधार’ से भी बचना था, सो उन्होंने अपना राजनीतिक धर्म निभाया।

अब यह दीगर बात है कि अपने बिहारवाले समधी जी को जन्मदिन का केक भले नहीं नसीब हुआ। होता भी कैसे, क्योंकि बिहारवाले समधी जहां बिहार में बहार आने से खुश हैं, वहीं सैफईवाले समधी बहार का मौसम छूट जाने से गमगीन हैं।

हालांकि सुख और दुख तो अपने साथी हैं, लेकिन ससुरी मलाल भी तो कुछ है। लिहाजा वे जन्मदिन के जश्न में कैसे शामिल होते। अपने लालूजी का भी आलू गोल ही रहता है। हालांकि उसके आकार में स्थिता नहीं रहती। कहा गया है कि राजनीति में लालू और सब्जी में आलू का कोई जोड़ नहीं है।

हां, अपने यूपी वाले समधी जी क्यों झुकें। उन्हें बिहार की बहार और हार से क्या मतलब है। यहां तो 2017 में बहार के दिन आने वाले हैं। लिहाजा, वह धर्म भी तो उन्हें निभाना है। समधी आज नहीं तो कल गले मिल जाएंगे। ई तो मान-मनौवल का रिश्ता है। अरे बिहार के रास में समधी जी महागांठ में नहीं बंध पाए तो क्या हुआ, अभी तो दिल्ली दूर है। जब बात बनती देखेंगे तो तो गले मिल जाएंगे, क्योंकि राजनीति में खूब गरियाने के बाद गले मिलना ही तो राजनीतिक धर्म कहलाता है। अरे भाड़ में जाएं अपने बिहार वाले समधी!

सैफईवाले समधी अपने यूपी में बिहारवाला दांव मारने में पीछे नहीं रहेंगे। लगे हाथ बहन जी का मन टटोला, लेकिन उड़नखटोला उड़ा तो उड़ा। नहीं उड़ा नहीं उड़ा। चलो इसी बहाने जश्न भी मन गया। अपने राम और रहीम भी खुश हो गए। आखिर तूफान में कूड़ा करकट तो आता ही है। आखिर ठाकुर साहब की योग माया का कुछ हिस्सा तो नेताजी के पास है ही।

कथा इतिश्री होने के बाद नारद जी बोले, “वाह! पितामहजी आपकी माया भी प्रबल है। इस ब्रह्मपुराण की महिमा अनन्य है। आप जो खिल देंगे उसे मिटाने वाला कोई नहीं है। आपके संमुद्र मंथन में अमृत और विष दोनों निकलता है। वह भी सबके हिस्से में बराबर-बराबर जाता है। समय को आप कितने सुंदर ढंग से सहेजते हैं। आप धन्य हैं।” बोलिए अथ अमरपुराणे यूपी बिहार खंडे राजनीतिक धर्मक्षेत्रे की जै। बोलिए सैफईवाले यदुवंशी की जै। (आईएएनएस/आईपीएन)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये इनके निजी विचार हैं)

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