राब्ता : कश्मीर की मिली-जुली तहजीब में जान फूंक रहा है फेसबुक पेज

नई दिल्ली, 18 मार्च (आईएएनएस)। दशकों की बगावत, आंतरिक कलह और सामाजिक कटुता के कारण विभाजन का दंश झेल रहे कश्मीरियों की जिंदगी में फेसबुक ने आशा की नई किरण जगाई है। फेसबुक पेज ‘राब्ता’ के जरिए कश्मीरी परिवार, दोस्त, सहपाठी और पड़ोसी एक-दूसरे के संपर्क में आ रहे हैं।

नई दिल्ली, 18 मार्च (आईएएनएस)। दशकों की बगावत, आंतरिक कलह और सामाजिक कटुता के कारण विभाजन का दंश झेल रहे कश्मीरियों की जिंदगी में फेसबुक ने आशा की नई किरण जगाई है। फेसबुक पेज ‘राब्ता’ के जरिए कश्मीरी परिवार, दोस्त, सहपाठी और पड़ोसी एक-दूसरे के संपर्क में आ रहे हैं।

फेसबुक पर ‘राब्ता’ पेज बनाये जाने के महज एक महीने में ही इसके 21,000 फालोवर हो गए हैं। राब्ता का अर्थ है संपर्क। इस पेज के माध्यम से एक-दूसरे से काफी दूर रहने वाले पांच कश्मीरी हिंदू पंडित और मुस्लिम परिवार एक-दूसरे के संपर्क में आए हैं।

दुबई स्थित पत्रकार समीर भट जम्मू-कश्मीर के सोपोर मूल निवासी हैं जो लाल-लाल सेब के लिए चर्चित है और कभी आतंक का अड्डा भी रहा है। भट अपने पड़ोसी कश्मीरी पंडित ‘बंटी भैया’ से संपर्क स्थापित करना चाहते थे। पेज एडमिन ने सभी फालोवर को कहा कि क्या वे सोपोर के बंटी के बारे में बता सकते हैं या उन्हें टैग कर सकते हैं। अचानक वह प्रकट हुए और आभासी तौर पर ही सही, लेकिन उनका अत्यंत भावुक मिलन हुआ।

बंटी भैया का असली नाम अरुण कौल है जो चंडीगढ़ में रहते हैं। दोनों के बीच 28 साल में पहली बार बातचीत हुई।

भट ने बंटी भैया और उनके परिवार के घाटी छोड़ने के बाद एक दूसरे से अलग होने को याद करते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि जैसे यह 28 साल तो दूर 28 सप्ताह भी नहीं, महज 28 दिन पुरानी बात हो।” उन्होंने बताया कि उन्हें बसंत की बारिश के बीच हेराथ यानी शिवरात्रि की याद आती थी, जब बंटी की मां उन्हें अखरोट देती थीं।

अनीस मकबूल ने अपने मित्र अनिल मोती की तलाश में आठ मार्च को पेज पर एक संदेश भेजा। दोनों कश्मीर के मशहूर मिशनरी स्कूल टिंड्रेल बिस्को में 1973 तक साथ पढ़े थे। स्कूल छोड़ने के बाद उनके बीच कभी बातचीत नहीं हुई। उनको लगता था कि 1990 के दशक के आरंभ में जब घाटी में आतंक चरम पर था तब मोती भी घाटी से पलायन कर गए होंगे। इसी सोच के साथ मकबूल ने अपने अन्य कश्मीरी पंडित मित्रों रमेश कल्पोश और पृथ्वी राज की तलाश में संदेश लिखा।

वह मोती से संपर्क स्थापित करने में कामयाब रहे, जो इन दिनों दिल्ली के पास गुरुग्राम में रहते हैं। मोती ने मकबूल से फोन पर बात की और दोनों ने अपनी-अपनी जिंदगी व परिवार के बारे में चर्चा की। उन्होंने एक-दूसरे को अपने-अपने घर आने का न्योता भी दिया।

पेज पर दोनों के मिलाप के बारे में बताते हुए कहा गया है कि मोती ने उन दिनों को याद किया जब उनको घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उनकी आंखों से वैसे ही आंसू झरने लगे जैसे बसंत की बारिश हो।

मित्रों व परिचितों की तलाश में संदेश पोस्ट करने वाले और भी लोग हैं, लेकिन वे इनकी तरह भाग्यशाली नहीं बन पाए। कश्मीर के कार्टूनिस्ट सुहैल नक्शबंदी अपने स्कूल की शिक्षिका ‘मुज्जू मैम’ बात करना चाहते थे जो उनको गणित की समस्याओं को हल करने में उनकी मदद करती थीं।

सुहैल ने कहा, “उस संकट में मुज्जू मैम मेरी जिंदगी में फरिश्ता बनकर आईं। उन्होंने मुझे गणित का सवाल हल करने को कहा। मैंने हिचकिचाते हुए कोशिश की लेकिन डर के कारण मैं नहीं कर पा रहा था। मुझे अपने कंधे पर हाथ का स्पर्श महसूस हुआ। मैंने नजर उठाकर देखा, मिस मुज्जू मुस्करा रही थीं। उन्होंने मुस्कारते हुए कहा, कोई बात नहीं, ठीक है।”

उन्होंने कहा, “उनके दिए हौसले और मार्गदर्शन में मेरा विश्वास बढ़ा। मेरे माता-पिता भी उनको मेरे लिए ईश्वर का भेजा मार्गदर्शक मानने लगे।”

लेकिन, वह अभी अपनी शिक्षिका से संपर्क स्थापित करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।

राब्ता पेज की पहल कश्मीरी जैबीर अहमद की है जो गुरुग्राम में विज्ञापन के क्षेत्र में काम करते हैं।

43 वर्षीय अहमद ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “ध्रुवीकरण के बावजूद हम व्यक्तिगत तौर पर रिश्ते बनाए हुए हैं। अपनी साझी विरासत, संस्कृति, संगीत, काव्य, खानपान और फिरन को लेकर हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।”

उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों के पलायन से न सिर्फ वे लोग विस्थापित हुए बल्कि इससे मित्र, पड़ोसी, गुरु और सहकर्मी बिछुड़ गए।

सरहद पार पाकिस्तान से आए आतंकियों द्वारा कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाए जाने के बाद कश्मीरी पंडितों का घाटियों से पलायन शुरू हुआ।

अहमद ने 1980 के दशक के अंतिम दौर में घाटी में आंतकी गतिविधि की शुरुआत से पूर्व वहां कश्मीरी हिंदू पंडितों और मुस्लिमों की साझी संस्कृति को याद किया।

उन्होंने कहा, “आज दोनों समुदायों के बीच कड़वाहट, गुस्सा और शत्रुता की भावना है। सोशल मीडिया पर रोज अपशब्द, निंदा और एक दूसरे को बांटने की बातों से घृणा फैलाई जा रही है।”

उन्होंने कहा, “सरकार और सिविल सोसाइटी की कई कोशिशों के बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है। इन प्रयासों को दोनों पक्षों की ओर से संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।”

उन्होंने उम्मीद जाहिर की है कि वह अपने अन्य कश्मीरी हिंदू व मुस्लिम साथियों के सहयोग से जो मुहिम चला रहे हैं, उससे विभाजित कश्मीरियों के बीच एकता कायम होगी जो मिलकर कश्मीर की अनोखी साझी संस्कृति कश्मीरियत का आधार हैं।

(यह साप्ताहिक फीचर श्रंखला आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम फाउंडेशन की सकारात्मक पत्रकारिता परियोजना का हिस्सा है।)

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