रियोनामा : सामाजिक आदान-प्रदान की मिसाल पेश कर रहे लेपल पिन संग्रहकर्ता

रियो डी जेनेरियो, 9 अगस्त (आईएएनएस)। ब्राजील की मेजबानी में खेलों का महाकुंभ जारी है और कोई भी उम्मीद कर सकता है कि ओलम्पिक आयोजन स्थलों के इर्द-गिर्द खेल प्रेमियों के बीच सिर्फ अपने देश, खेल, खिलाड़ियों और जीत-हार की बातें चल रही होंगी।

रियो डी जेनेरियो, 9 अगस्त (आईएएनएस)। ब्राजील की मेजबानी में खेलों का महाकुंभ जारी है और कोई भी उम्मीद कर सकता है कि ओलम्पिक आयोजन स्थलों के इर्द-गिर्द खेल प्रेमियों के बीच सिर्फ अपने देश, खेल, खिलाड़ियों और जीत-हार की बातें चल रही होंगी।

लेकिन आप उम्मीद भी नहीं कर सकते कि कोई आकर आपसे कहेगा कि ‘आप मुझे यदि इस देश का लेपल पिन देंगे तो मैं आपको अमुक देश का लेपल पिन दे सकता हूं।’

ओलम्पिक खेलों का गवाह बनने दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए इन लेपन पिन संग्रहकर्ताओं ने वास्तव में ओलम्पिक में खेल के वातावरण को सामाजिक आदान-प्रदान और सौहार्द के रंगों से भर दिया है।

ओलम्पिक आयोजन स्थलों के बाहर अपने संग्रह की प्रदर्शनी लगाकर बैठे इन लेपल पिन संग्रहकर्ताओं का यह कारोबार नहीं, बल्कि शौक है।

ओलम्पिक खेलों में हिस्सा लेने आए विभिन्न देश इस तरह के कोट में लगाने वाले लेपल पिन उपहार के तौर पर बांटते हैं और कुछ बड़ी कंपनियां और प्रायोजक भी ऐसा करते हैं। खेल आयोजकों ने भी अनेकानेक रंगों, आकार और डिजाइन में इस तरह के लेपल पिन बांटने के लिए बनवाए हैं।

जहां ओलम्पिक के शुरुआती दौर में ये लेपल पिन कार्डबोर्ड के बनाए जाते थे, वहीं अब अधिकांश लेपल पिन धातु या प्लास्टिक से बनने लगे हैं।

ये पिन अब ओलम्पिक अभियान का प्रतीक बन चुके हैं और ओलम्पिक के इतिहास की कहानी भी बयां करते हैं।

लेकिन कुछ ऐसे भी जुनूनी लोग हैं जो हर चार साल पर न सिर्फ खेलों का लुत्फ उठाने बल्कि इन लेपल पिनों को संग्रहीत करने के लिए अपनी नौकरियों से लंबी छुट्टी लेकर ओलम्पिक खेलों का हिस्सा बनने पहुंच जाते हैं।

अमेरिका के वजीर्निया के रहने वाले टिमोथी जेमीसन को ही लें। वह पेशे से वास्तुकार हैं और प्रत्येक चार साल पर होने वाले ओलम्पिक खेलों की अवधि को छोड़कर वह होटलों के निर्माण में इंजीनियरों की मदद करते हैं।

वह ओलम्पिक और शीतकालीन ओलम्पिक को मिलाकर 14 ओलम्पिक खेलों का हिस्सा बन चुके हैं और आजीवन ऐसा करना चाहते हैं।

टिमोथी ने कहा, “मैं ओलम्पिक शुरू होने से तीन महीने पहले से ही तैयारियां शुरू कर देता हूं और हर बार ओलम्पिक खेलों से अपने साथ 2,500 से 3,000 लेपल पिन इकट्ठे कर ले जाता हूं।”

टिमोथी के पास इस समय करीब 30,000 लेपल पिनों का संग्रह है। इनमें से अधिकांश उन्होंने आदान-प्रदान के जरिए हासिल की हैं, लेकिन कई बार वह कुछ पिनें बेचते भी हैं।

टिमोथी ने बताया, “कई बार इन्हें बेचकर मेरा आने-जाने का हवाई खर्च निकल आता है और कई बार तो होटलों में रुकने का खर्च भी।” हालांकि टिमोथी ने बताया कि लेपल पिनों को बेचकर कमाई करना उनका उद्देश्य नहीं है।

वह एक पिन अमूमन 10 से 20 डॉलर के बीच में बेच देते हैं और सबसे महंगी पिन उन्होंने 100 डॉलर में बेची है।

टिमोथी बताते हैं कि जापान के नागानों में 1998 में हुए शीतकालीन ओलम्पिक के दौरान उनके साथ सबसे रोचक वाकया हुआ था। जापानी भी लेपल पिनों के बेहद शौकीन होते हैं और उन्होंने इकट्ठी की गई 300 नागानो पिनों को बहुत ही अच्छी कीमतों पर बेचा था।

टिमोथी ने बताया, “जापानी लेपल पिनों के दीवाने होते हैं।”

स्पेन के बार्सिलोना से आए फ्रेदरिक गारिगा देखना चाहते हैं कि यहां वह कितने पिन बदल सकते हैं, क्योंकि उन्हें बेचने का उनका कोई इरादा नहीं है।

गारिगा ने बताया, “रियो ओलम्पिक संपन्न होते-होते शायद मैं 2,000 से 3,000 पिनों की अदला-बदली कर लूंगा और संभव है कि 200 पिनें बेच भी लूं। हालांकि यह सिर्फ मेरा शौक है।”

गारिगा बार्सिलोना में सरकारी नौकरी करते हैं और ओलम्पिक के दौरान कुछ सप्ताह का अवकाश निकाल ही लेते हैं। उन्होंने कहा, “मुझे ऐसा कर बहुत खुशी मिलती है और ओलम्पिक खेलों का भी लुत्फ उठा लेता हूं।”

स्टेडियम के नजदीक या प्रेस सेंटर में प्रवेश के लिए इन लेपल पिन संग्रहकर्ताओं को आधिकारिक मान्यता तो मिलती है, लेकिन स्पर्धाओं का हिस्सा बनने के लिए उन्हें अन्य दर्शकों की ही तरह टिकट खरीदने पड़ते हैं। लेकिन उन्हें इसकी कोई शिकायत नहीं है।

ये पिन संग्रहकर्ता जहां भी अपनी अस्थायी दुकान लगा बैठते हैं, सैकड़ों की संख्या में पिन चाहने वाले लोगों की भीड़ लग जाती है और उनमें नियमित दर्शकों के अलावा खिलाड़ी और मीडियाकर्मी भी शामिल हैं।

लेपल पिनों के संग्रह का शौक कई देशों में संगठित रूप भी ले चुका है और वहां बाकायदा पिन सोसायटी और पिन क्लब भी अस्तित्व में आ चुके हैं।

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