रंगभरी एकादशी पर रानी गौरा का गौना कराकर लौट रहे भोले बाबा की रजत पालकी जब विश्वनाथ दरबार की ओर बढ़ी तो अबीर गुलाल की आंधी चल पड़ी। जमीन से आसमान तक सब लाल लाल। घंटों की घन घन और डमरू की ताल। सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा के साथ ही रंग पर्व की हुड़दंग शुरू हो गई त्रैलोक्य न्यारी काशी में….
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