सांसद पप्पू यादव की पुस्तक ‘जेल’ का हुआ लोकार्पण (फोटो सहित)

पटना, 9 मई (आईएएनएस)। जन अधिकार पार्टी के संरक्षक और सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पुस्तक जेल का बुधवार को पटना के बापू सभागार में लोकर्पण किया गया। इस पुस्तक में पप्पू ने कैदियों की यातना, प्रताड़ना और जेल में खुद के अनुभवों को शब्दों का स्वरूप दिया है।

पप्पू की इस पुस्तक का लोकर्पण कांग्रेस की सांसद रंजीत रंजन, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, पत्रकार दिलीप मंडल व अर्चना राजहंस मधुकर ने संयुक्त रूप से किया।

लोकर्पण के मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने सांसद पप्पू यादव के संघर्षों की चर्चा करते हुए कहा कि वे जन्मजात विद्रोही हैं। पुस्तक की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह पुस्तक चुनौतियों से लड़ने की ताकत व व्यवस्था बदलने की प्रेरणा देती है।

लोकार्पण समारोह के मौके पर संकल्प और आजादी अभियान की शुरुआत करते हुए सांसद पप्पू यादव ने कहा कि बिहार बदलाव की भूमि रही है। बदलाव की शुरुआत बिहार से ही हुई है। उन्होंने कहा कि इस अभियान के साथ पार्टी बदलाव की शुरुआत कर रही है।

जेल में व्याप्त अराजकता में सुधार का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा, अगर पार्टी सरकार में आती है तो सामान्य और संगीन किस्म के अपराध के आरोपियों के लिए अलग-अलग जेल बनाई जाएगी। सबको समय पर न्याय मिले, यही प्राथमिकता होगी।

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी बालश्रम मुक्त बिहार बनाएगी और 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चों को मजदूरी नहीं करने दिया जाएगा।

सांसद ने कहा कि जिनका कोई इतिहास नहीं है, वे आज इतिहास बदलने की बात कर रहे हैं। जिन्ना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मुसलमानों के नाम पर दलित, पिछड़े और वंचित वर्ग में आ रही जागृति को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक गैरबराबरी को समाप्त करने की पक्षधर है।

पप्पू यादव की पत्नी और कांग्रेस की सांसद रंजीत रंजन ने किताब में कैदियों की प्रताड़ना की चर्चा करते हुए कहा कि देश का कोई भी कानून जेल में अमानवीय व्यवहार का अधिकार नहीं देता है। इसके बावजूद जेलों में कैदियों के साथ दुर्व्यवहार और अमानवीय व्यवहार होता है। पप्पू यादव की चर्चा करते हुए रंजीत रंजन ने कहा, वे अपनी निराशा से निकलकर आगे की ओर देखते रहे हैं। खुद से अधिक दूसरे की चिंता करते रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने कहा कि देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रित संस्थाएं खतरे में हैं। व्यवस्था से लोगों की उम्मीद टूटने लगी है, विश्वास उठने लगा है। उन्होंने कहा कि जेल नामक इस पुस्तक में जेल के सामाजिक व राजनीतिक बनावट को समझने का प्रयास किया गया है। एक कैदी के सामाजिक और पारिवारिक जीवन के अंतद्वर्ंद्व को भी आसानी से समझा जा सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार अर्चना राजहंस मधुकर ने कहा कि सामाजिक सच्चाईयों को समझने में यह पुस्तक मददगार होगी।

इस मौके पर कई नेता और साहित्यकार उपस्थित थे।

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