बेंगलुरू, 24 मई (आईएएनएस)। सदियों पुरानी धारणा कि सिंधु लिपि एक भाषा है, इसके विपरीत एक अनुभवी विज्ञान इतिहासकार ने दावा किया है कि यह लिपि संख्यात्मक है, जो सिंधु घाटी सभ्यता (3000-1900 ई.पू) की मुहरों और कलाकृतियों पर अंकित संख्याओं और प्रतीकों से स्पष्ट है।
बेंगलुरू, 24 मई (आईएएनएस)। सदियों पुरानी धारणा कि सिंधु लिपि एक भाषा है, इसके विपरीत एक अनुभवी विज्ञान इतिहासकार ने दावा किया है कि यह लिपि संख्यात्मक है, जो सिंधु घाटी सभ्यता (3000-1900 ई.पू) की मुहरों और कलाकृतियों पर अंकित संख्याओं और प्रतीकों से स्पष्ट है।
90 वर्षीय इतिहासकार बी.वी.सुब्बारायप्पा ने आईएएनएस को बताया, “सिंधु लिपि को समझने के प्रयास इस धारणा पर आधारित थे कि किसी भी लिपि को भाषा और लिखावट से संप्रेषित किया जाना चाहिए। दुनियाभर में ऐसी कई भाषाएं हैं, जिनकी आज तक कोई लिपि नहीं है।”
हालांकि, सिंधु सभ्यता 90 साल पहले आई, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक जॉन मार्शल ने 1924 में इसकी खोज के बारे में ‘द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज’ में लिखा था। यह रहस्यमय लिपि दुनियाभर के भाषाविदों, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों द्वारा विभिन्न व्याख्याओं की वजह से विवादास्पद बन गई।
सुब्बारायप्पा ने कहा, “सिंधु घाटी और हड़प्पा संस्कृति में 4,000 से अधिक मुहरों और अन्य खुदी हुई कलाकृतियों का पता लगाया गया। कृषि उत्पादन और प्रबंधन की जरूरतों को पूरा करने में उनका इस्तेमाल किया गया।
संख्यात्मक सिंधु लिपि की बेजोड़ विशिष्टताओं को दिखाते हुए उन्होंने कहा कि घाटी के लोग व्यापक रूप से अपने दैनिक व्यवसायों के लिए दशमलव, जमा और गुणात्मक संख्यात्मक प्रणाली का इस्तेमाल करते थे।
उन्होंने कहा, “जौ, गेहूं और कपास की छह, चार और दो कतारों की श्रेणियों का सांकेतिक प्रतिनिधित्व एक पशु (गेंडा) के रूप में किया जाता था, जो 1,100 मुद्राओं का प्रतीक था। इस तरह खाद्यान्नों का हिसाब रखा जाता था।”
इसी तरह कृषि और उत्पादन संबंधी कार्यो का बहीखाता रखने के लिए अन्य जानवरों, जैसे भैंस, बैल और गैंडों का इस्तेमाल किया जाता था।
अंकों के लिए संकेतों की जरूरत होती है। लिखने का पहला प्रयास संख्यात्मक रूप में ही हुआ था, जिसके प्रमाण हैं।
अशोक, नानेघाट और कुषाण शिलालेखों में भी संख्यात्मक रूप में दस सिंधु स्वरूपों का इस्तेमाल किया जाता है।
सुब्बारायप्पा ने कहा, “सिंधु मुहरों पर दो, तीन और चार बार संकेतों का दोहराव भाषा में नहीं बल्कि सिर्फ संख्यात्मक रूप में ही संभव है।”
अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के तीन विद्वानों स्टीव फार्मर, रिचर्ड स्प्रोट और माइकल विटजल ने 2004 में एक शोधपत्र प्रकाशित किया था, जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि सिंधु लिपि कोई भाषा नहीं थी, क्योंकि उस समय सिंधु घाटी संस्कृति के लोग साक्षर नहीं थे।
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