नई दिल्ली, 18 जनवरी (आईएएनएस)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों में नर्सरी दाखिले में प्रबंधन कोटा खत्म करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया।
न्यायमूर्ति मनमोहन ने दिल्ली सरकार और इसके शिक्षा विभाग से 25 जनवरी तक जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।
न्यायालय ने कहा कि सरकार ‘निजी स्कूलों की स्वायत्तता’ नहीं छीन सकती। न्यायालय ने कहा कि अभिभावक नर्सरी दाखिले के फार्म को स्कूलों द्वारा तय मानदंडों के आधार पर भर सकते हैं, लेकिन इस बारे में अंतिम फैसला अदालती फैसले के आधार पर होगा।
अदालत ने सरकार से राष्ट्रीय राजधानी में सार्वजनिक स्कूलों की हालत के बारे में भी पूछा।
न्यायालय ने कहा, “निजी स्कूलों में भीड़ है, क्योंकि सरकारी स्कूलों का स्तर अच्छा नहीं है। जब आप सार्वजनिक स्कूलों को नहीं सुधार पा रहे तो निजी स्कूलों पर कब्जा करने लगे। अपने घर को पहले दुरुस्त करें।”
न्यायालय ने यह नोटिस कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान जारी किया। इनमें गैरसहायता प्राप्त एवं मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की एक्शन कमेटी की याचिका भी शामिल है। इसमें कहा गया है कि प्रबंधन कोटा खत्म करने का सरकारी आदेश ‘पूरी तरह से उसके (सरकार के) अधिकार क्षेत्र से बाहर है।’ यह स्कूलों की स्वायत्तता को पूरी तरह से छीन लेने वाला है, इसलिए इसे रद्द कर देना चाहिए।
याचिका में दलील दी गई है, “99 फीसदी मान्यता प्राप्त और सरकारी सहायता न पाने वाले स्कूल दाखिले में निष्पक्ष, तार्किक और पारदर्शी मानदंडों का पालन कर रहे हैं।”
छह जनवरी को इस फैसले का ऐलान करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि इसका मकसद निजी स्कूलों की दाखिला प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है। केजरीवाल ने कहा था कि गरीबों का 25 फीसदी कोटा पहले की ही तरह बना रहेगा। साथ ही केजरीवाल ने कहा था कि स्कूलों को यह हक हासिल रहेगा कि वे अपने कर्मचारियों के बच्चों को दाखिला देने के लिए मानदंड तय कर सकें।
अभी तक स्कूल 20 फीसदी सीटें प्रबंधन कोटे के तहत रखते रहे हैं। 25 फीसदी सीट आर्थिक रूप से कमजोर वर्गो के लिए आरक्षित हैं।
दिसंबर 2013 में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सिफारिश पर उपराज्यपाल नजीब जंग ने अधिसूचना जारी कर निजी स्कूलों में नर्सरी दाखिले का प्रबंधन कोटा खत्म कर दिया था।
स्कूलों ने इसे चुनौती दी थी। नवंबर 2014 में उच्च न्यायालय ने उपराज्यपाल द्वारा दाखिले के लिए जारी दिशा-निर्देशों को रद्द कर दिया और स्कूलों को अशोक गांगुली समिति की सिफारिशों के हिसाब से दाखिले के मानदंड तय करने की अनुमति दी।
इसके बाद, दिल्ली सरकार ने मामले को एक वृहत्तर पीठ को सौंपने की अपील की।
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