हरियाणा ने पृथक उच्च न्यायालय के लिए उठाई आवाज

चंडीगढ़, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों के पास भी अपना-अपना अलग उच्च न्यायालय होने का तर्क देते हुए हरियाणा ने अपने लिए भी पृथक उच्च न्यायालय की मांग कर डाली है।

चंडीगढ़, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों के पास भी अपना-अपना अलग उच्च न्यायालय होने का तर्क देते हुए हरियाणा ने अपने लिए भी पृथक उच्च न्यायालय की मांग कर डाली है।

गौरतलब है कि हरियाणा और पंजाब के लिए चंडीगढ़ में एक ही उच्च न्यायालय है। हरियाणा अब चंडीगढ़ में ही अपने लिए एक अलग उच्च न्यायालय की मांग कर रहा है। हरियाणा चाहता है कि दोनों राज्यों के मौजूदा संयुक्त उच्च न्यायालय को अलग-अलग कर दिया जाए और हरियाणा के लिए एक पृथक हरियाणा उच्च न्यायालय का गठन कर दिया जाए।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पृथक उच्च न्यायालय के लिए दावा मजबूत बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार के सामने पूर्वोत्तर के राज्यों का संदर्भ देते हुए कहा, “वर्ष 2013 में मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा के लिए पृथक उच्च न्यायालय का गठन किया गया।”

उस समय तक मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा को गुवाहाटी उच्च न्यायालय की सेवा प्राप्त थी।

अपने लिखित संदेश में मुख्यमंत्री ने कहा, “गुवाहाटी उच्च न्यायालय के सामने लंबित कुल मामलों की संख्या 52,897 देखते हुए यह बंटवारा किया गया। लंबित मामलों में मेघालय के मामले केवल 812 थे, मणिपुर के 3,794 और त्रिपुरा के 6,393 मामले थे।”

खट्टर ने रेखांकित किया, “पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के समने लंबित मामलों की संख्या 2,79,699 है जिनमें से हरियाणा के मामलों की संख्या 1,40,359 है, जो पंजाब के 1,24,575 मामलों से अधिक है।”

हरियाणा 2002 से ही पृथक उच्च न्यायालय की मांग करता आ रहा है और हरियाणा विधानसभा ने मार्च 2002 और दिसंबर 2005 में ध्वनिमत से इस संबंध में एक प्रस्ताव भी पारित किया था। फिर भी केंद्र सरकार ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

अब हरियाणा चाहता है कि संबंधित अधिनियम में उचित संशोधन के लिए केंद्र सरकार एक उपयुक्त विधेयक लाए।

चंडीगढ़ स्थित हरियाणा और पंजाब के संयुक्त उच्च न्यायालय में हरियाणा का प्रतिनिधित्व करने वाले न्यायाधीशों की संख्या कम (40 फीसदी) और पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले न्यायधीशों की अधिक (60 फीसदी) होने के कारण हरियाणा अब अलग उच्च न्यायालय की मांग को लेकर उग्र हो उठा है।

हरियाणा को 1966 में पंजाब से अलग कर दूसरा राज्य गठित करने के समय ही न्यायाधीशों के प्रतिनिधित्व पर 60:40 अनुपात पर सहमति बनी थी।

हरियाणा ने इस अनुपात को ‘भेदभावकारी’ करार दिया है और मौजूदा उच्च न्यायालय में समान प्रतिनिधित्व की मांग की है।

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