हिंदी पर सबका अधिकार, किसी पार्टी की जागीर नहीं : मृणाल पांडे (साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 17 सितम्बर (आईएएनएस)। हाल में संपन्न हुए 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन निश्चित तौर पर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों ने किया, जिन्होंने इस समारोह से हिंदी लेखकों, हिंदी मीडिया के लोगों व छात्रों को अलग रखा। एक दिग्गज पत्रकार व प्रख्यात लेखिका ने यह बात कही।

नई दिल्ली, 17 सितम्बर (आईएएनएस)। हाल में संपन्न हुए 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन निश्चित तौर पर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों ने किया, जिन्होंने इस समारोह से हिंदी लेखकों, हिंदी मीडिया के लोगों व छात्रों को अलग रखा। एक दिग्गज पत्रकार व प्रख्यात लेखिका ने यह बात कही।

सम्मेलन के एक सत्र की अध्यक्षता करने वाली वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे ने सहज महसूस किया कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने हिंदी के उन लेखकों को न बुलाकर गलती की, जो सम्मेलन में अपना अतुलनीय योगदान दे सकते थे। सम्मेलन का उद्देश्य केवल हिंदी भाषा का शुद्धिकरण था।

उन्होंने कहा, “भाषा पर सबका अधिकार है और एक पार्टी झाड़ू उठाकर इसे साफ नहीं कर सकती। जमीनी स्तर पर काम करने वाले लेखकों को आयोजकों ने इस सम्मेलन से दूर रखा।”

मृणाल ने टेलीफोन पर एक साक्षात्कार में आईएएनएस से कहा, “संपूर्ण सम्मेलन का आयोजन निश्चित तौर पर राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों द्वारा किया गया, जिनका मकसद हिंदी का शुद्धिकरण था। आप कौन सा शुद्धिकरण करेंगे? यदि आप शुद्धिकरण करेंगे, तो कुछ बचेगा ही नहीं (भाषा)।”

प्रसार भारती की पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि भाषा के शुद्धिकरण की धारणा बेतुकी थी।

उन्होंने कहा, “जैसा कि हम जानते हैं कि आज की तारीख में जो हिंदी हम बोलते हैं वह अवधि, भोजपुरी, ब्रज भाषा व हरियाणवी जैसी बोलियों पर आधारित है। केवल 20 फीसदी हिंदी ही शुद्ध संस्कृत पर आधारित है।”

मृणाल ने कहा कि बाकी हिंदी पारसी, पुर्तगाली, अरबी, अंग्रेजी व अन्य भाषाओं पर आधारित है, जो सदियों के दौैरान विभिन्न देशों से आए व्यापारियों व सेनाओं के साथ आई।

मृणाल ने कहा कि अगर सरकार हिंदी को बढ़ावा देने को लेकर गंभीर है, तो उसे अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा की बारीकियों व स्वरों को ध्यान में रखते हुए हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर के विकास पर जोर देना चाहिए, जो बोलचाल की हिंदी के विभिन्न प्रकारों के सम्मत हो।

मृणाल ने कहा कि हिंदी भाषा के एक शब्द का उच्चारण विभिन्न हिंदी भाषी क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से होता है और सरकार को सभी क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए हिंदी भाषा उपयोगकर्ताओं के लिए एक सर्च इंजन विकसित करने की दिशा में काम करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “भाषाई समस्या, शब्दों के अर्थ, बहुविकल्प व स्वर, इन सभी का निर्धारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारकों द्वारा नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे अकादमी से जुड़े नहीं हैं। उन्हें इस बात का घमंड है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है। मैंने अपना संपूर्ण जीवन भाषा के व्यावसायीकरण के प्रयास में लगाया है।”

उन्होंने कहा, “सम्मेलन के दौरान सारा जोर हिंदी को भारत के गर्व के स्रोत के रूप में बेचने, हिंदी के शुद्धिकरण और वैश्विक बाजार में भारी संख्या में हिंदी को उपयोगकर्ताओं के मुद्रीकरण पर दिया गया।”

मृणाल के मुताबिक, जोहांसबर्ग में साल 2012 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के तहत आयोजित हुए 9वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकार द्वारा उस वक्त एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसके मुताबिक हिंदी के संपूर्ण मानकीकरण पर काम करने और कंप्यूटर बनाने वाली सभी कंपनियों के लिए ड्यूअल की बोर्ड का विकास अनिवार्य तौर पर करने की बात कही गई थी। यह भी फैसला किया गया था कि वर्ल्ड वाइड वेब को हिंदी के मित्रवत होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जोहांसबर्ग में हुए सम्मेलन में शामिल हुई उनकी एक मित्र ने कहा कि प्रस्ताव को सरकार के पास भेजा गया था, लेकिन कोई नहीं जानता उस प्रस्ताव का आखिर हुआ क्या।

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