हिमाचल में 8वीं के तीन-चौथाई विद्यार्थियों में मेधा की कमी : कैग

शिमला, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। यह चौंकानेवाला, पर सच है कि 82.8 फीसदी साक्षरता वाले राज्य में सरकारी स्कूलों में कक्षा तीन के 20 फीसदी छात्र ऐसे हैं जो शब्द और संख्या नहीं पहचानते।

शिमला, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। यह चौंकानेवाला, पर सच है कि 82.8 फीसदी साक्षरता वाले राज्य में सरकारी स्कूलों में कक्षा तीन के 20 फीसदी छात्र ऐसे हैं जो शब्द और संख्या नहीं पहचानते।

इसके अलावा कक्षा आठ में पढ़ने वाले 74 फीसदी छात्रों में कक्षा के लिए उपयुक्त मेधा नहीं है। यह जानकारी नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की एक रपट में सामने आई है।

रपट में कहा गया है कि राज्य के 31 फीसदी स्कूलों के भवन में केवल एक या दो कमरे हैं। इन स्कूलों में 118,036 बच्चे पढ़ते हैं।

यह सर्वेक्षण सर्व शिक्षा अभियान द्वारा किया गया। सर्व शिक्षा अभियान केंद्र सरकार का एक देशव्यापी अभियान है। यह सर्वेक्षण छात्रों की सीखने की उपलब्धि और उनकी प्रगति का आंकलन करने के लिए किया गया है।

मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा कि छात्रों की शिक्षा के स्तर का यह मुद्दा विभिन्न सरकारी रपटों और सर्वेक्षणों में सामने आ चुका है।

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “यह एक गंभीर मुद्दा है। अब शिक्षकों को इस बात के लिए उत्तरदायी बनाया गया है कि प्रत्येक छात्र को दक्षता प्राप्त हो। जो छात्र शिक्षा में कमतर हैं, शिक्षकों को उन्हें विशेष शिक्षण प्रदान करना होगा।”

राज्य शिक्षा विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “व्यापक और सतत मूल्यांकन प्रणाली की शुरुआत के बाद प्राथमिक और प्रारंभिक स्तर पर शिक्षा के मानकों में उल्लेखनीय गिरावट आई है। उन्होंने कहा कि निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को संशोधित करने की जरूरत है।”

नाम जाहिर न करने की शर्त पर अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, “केवल उन्हीं छात्रों को कक्षा आठ से आगे भेजना चाहिए जो एक निश्चित मात्रा में शिक्षा प्राप्त कर लें। उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण प्रणाली को पुन: प्रस्तुत करना चाहिए और 14 साल की उम्र तक के विद्यार्थियों को आवश्यक रूप से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। इससे छात्रों द्वारा प्राप्त शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जो कि उच्चतर कक्षाओं में कम अंक अर्जित करते हैं।”

राज्य के लिए हालांकि राहत की बात यह है कि यहां के 97 फीसदी सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग से शौचालय हैं, 98 फीसदी स्कूलों में प्रयोगशालाएं हैं और 84 फीसदी स्कूलों में खेलने के लिए मैदान हैं।

कैग ने अपनी रपट में सरकारी स्कूलों में अपर्याप्त बुनियादी ढांचे का भी मामला उठाया है।

इसमें कहा गया है कि 15,162 स्कूलों में से 577 स्कूल (चार फीसदी) ऐसे हैं, जो केवल एक कमरे से संचालित हो रहे हैं। इन स्कूलों में 17,824 विद्यार्थी पढ़ते हैं।

इसी प्रकार से 4,075 स्कूल (27 फीसदी) केवल दो कमरों से संचालित होते हैं। इन स्कूलों में 100,208 विद्यार्थी पंजीकृत हैं।

कैग ने कहा कि निजी स्कूलों की ओर विद्यार्थियों के रुख का एक बड़ा कारण सरकारी स्कूलों का कमजोर बुनियादी वातावरण है।

कैग ने अपनी रपट में कहा है कि कक्षा दो से आठ तक के 508,944 विद्यार्थियों का सर्वेक्षण किया गया। इनमें से 16,823 (3.30 फीसदी), 13,785 (2.70), 16,555 (3.30 फीसदी) और 12,066 (2.40 फीसदी) ने क्रमश: अंग्रेजी, हिंदी, गणित और विज्ञान में क्रमश: 100 में से शून्य अंक प्राप्त किए हैं।

विधानसभा के पटल पर पिछले हफ्ते रखी गई इस रपट में सरकारी लेखा परीक्षक ने कहा कि शिक्षकों की अनुप्लब्धता भी शिक्षा के मानक बिगड़ने का एक प्रमुख कारण है।

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