नई दिल्ली, 12 सितम्बर (आईएएनएस)। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने कहा है कि आईएमए नेतृत्व, प्रदेश अध्यक्ष और आईएमए के सभी पूर्व अध्यक्षों का विचार है कि प्रस्तावित चिकित्सा विधेयक समाज विरोधी है और इसे तुरंत रद्द कर दिया जाना चाहिए। आईएमए ने कहा कि इससे भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा।
आईएमए के मुताबिक, प्रस्तावित चिकित्सा विधेयक में कुछ भी नया नहीं हैं। विधेयक में मौजूद प्रस्तावित सभी बातों पर भारतीय चिकित्सा परिसद (आईएमसी) अधिनियम के तहत पहले ही काम कर रही है। नया प्रस्तावित विधेयक इस मौजूदा विधेयक को नकार रहा है। यह नई बोतल में पुरानी शराब वाली बात है।
आईएमए के मनोनीत अध्यक्ष डॉ के.के. अग्रवाल ने कहा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक अलोकतांत्रिक है और यह चुने हुए और नामित किए गए सदस्यों के प्रावधान को खत्म करता है।
उन्होंने कहा, “केवल नामित सदस्यों को परिषद में लेने का प्रावधान लोकतंत्र का मजाक है। अगर यह विधेयक लागू हो गया तो स्वायत्तता खत्म हो जाएगी और इस पर स्वास्थ्य मंत्रालय का कब्जा हो जाएगा। यह गैर-एमबीबीएस डॉक्टरों को फैसला लेने वाला बना देगा और उन्हें नेशनल मेडिकल रजिस्ट्रार में पंजीकृत कर मेडिकल पेशे के लिए खतरा खड़ा कर देगा।”
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय सभी संगठनों और संस्थाओं को नियंत्रित करता है, जिसमें डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, नर्सिग काउंसिल, फार्मेसी काउंसिल भी शामिल हैं। यह विधेयक केवल एमसीआई को खत्म करने और सुधारने के लिए लाया जा रहा है।
आईएम ने कहा है, “नया विधेयक प्रदेश की चिकित्सा परिषद को नियंत्रित नहीं कर सकता, वह कानून के अनुसार स्वतंत्र संस्थाएं हैं। अगर यह विधेयक पास होता है तो यह दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ जाएगा, जो कहता है कि एसोसिएशन को परिषद के अधीन नहीं लाया जा सकता।”
आईएमए ने यह आशंका जताई है कि ऐसा लगता है कि नया विधेयक ब्रिज्ड डिगरी वालों या बिना एमबीबीएस की डिग्री वाले आरएमपी को पिछले दरवाजे से मान्यता दिलाने के लिए बनाया गया है।
एमबीबीएस करने के बाद डॉक्टरों को एग्जिट परीक्षा के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। नया विधेयक इस परीक्षा में फेल होने वालों को भी प्रैक्ट्सि करने की छूट देता है। इससे असमानता बढ़ेगी और अन्याय को बढ़ावा मिलेगा।
आईएमए ने कहा है कि मेडिकल कॉलेजों को 60 प्रतिशत तक सीटों पर मनमर्जी की फीस वसूलने की अनुमति देने से भ्रष्टाचार बढ़ेगा। निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस पर नियंत्रण होना चाहिए।
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