दृढ़ संकल्प, आत्मप्रेरणा ने दिलाया दूसरा स्वर्ण : देवेंद्र झाझरिया

नई दिल्ली, 14 सितम्बर (आईएएनएस)। ब्राजीलियाई महानगर रियो डी जनेरियो में चल रहे पैरालम्पिक खेलों में नया विश्व कीर्तिमान रचते हुए दूसरी बार पैरालम्पिक स्वर्ण पदक जीतने वाले भारतीय एथलीट देवेंद्र झाझरिया का मानना है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद ‘आत्मशक्ति’ और दृढ़ संकल्प ने उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया।

नई दिल्ली, 14 सितम्बर (आईएएनएस)। ब्राजीलियाई महानगर रियो डी जनेरियो में चल रहे पैरालम्पिक खेलों में नया विश्व कीर्तिमान रचते हुए दूसरी बार पैरालम्पिक स्वर्ण पदक जीतने वाले भारतीय एथलीट देवेंद्र झाझरिया का मानना है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद ‘आत्मशक्ति’ और दृढ़ संकल्प ने उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया।

गांधीनगर में भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) प्रशिक्षण केंद्र के कोच देवेंद्र ने रियो से आईएएनएस को बुधवार को कहा, “अगर आपमें आत्मबल है तो दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। मैंने 12 साल पहले एथेंस पैरालम्पिक-2004 में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता था। उसके बाद मेरी दृढ़ इच्छाशक्ति और समर्पण की भावना ने मुझे यह उपलब्धि दोबारा हासिल करवाई।”

विश्व रैंकिंग में तीसरे पायदान पर मौजूद देवेंद्र ने कहा, “इसकी अनुभूति शब्दों में बयां नहीं की जा सकती..यह किसी सपने के सच होने जैसा है। एथेंस पैरालम्पिक में भी मैंने विश्व रिकॉर्ड तोड़ा था, लेकिन इस बार इसके मायने और विशेष हो गए हैं। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी अभियान में सफल हो गया हूं।”

एक हाथ से अपंग देवेंद्र ने एथेंस पैरालम्पिक की भाला फेंक स्पर्धा के एफ46 वर्ग में 62.15 मीटर के साथ नया विश्व कीर्तिमान रच पहली बार स्वर्ण पदक जीता था। देवेंद्र ने रियो पैरालम्पिक में मंगलवार को अपने पूर्व प्रदर्शन में सुधार करत हुए 63.97 मीटर दूरी हासिल की और एक बार फिर नए विश्व कीर्तिमान के साथ करियर का दूसरा स्वर्ण पदक हासिल किया।

एथेंस पैरालम्पिक के बाद देवेंद्र बीजिंग पैरालम्पिक-2008 और लंदन पैरालम्पिक-2012 में हिस्सा नहीं ले पाए।

उन्होंने कहा, “23 साल की उम्र में स्वर्ण पदक हासिल करने के 12 साल बाद 35 वर्ष की आयु में वही शारीरिक क्षमता बनाए रख पाना बेहद कठिन रहा। लेकिन 12 वर्षो के लंबे अंतराल के बाद फिर से स्वर्ण पदक हासिल करना खुशी को और बढ़ा देता है। मैं साई केंद्र में हर दिन चार घंटे (सुबह दो घंटे और शाम में दो घंटे) तक अभ्यास करता था।”

झाझरिया ने कहा, “लेकिन फिनलैंड में प्रशिक्षण सत्र के दौरान मैंने हर दिन सात-सात घंटे कठिन अभ्यास किया। इससे वहां भी अधिकारियों को महसूस हुआ कि भारतीय कितने परिश्रमी होते हैं। इसलिए मैं गर्व से कह सकता हूं कि यह स्वर्ण पदक मेरी उस कठिन परिश्रम और समर्पण का परिणाम है।”

झाझरिया ने सरकार के ‘टार्गेट ओलम्पिक पोडियम’ (टीओपी) योजना के तहत मिली मदद को भी इसका श्रेय दिया और उनका कहना है कि इसके बिना ऐसा परिणाम नहीं मिल पाता।

रियो पैरालम्पिक उद्घाटन समारोह में भारत के ध्वजवाहक झाझरिया ने कहा, “मैं अपनी इस जीत का श्रेय सरकार की टीओपी योजना को भी देना चाहूंगा। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि इसी तरह मदद मिलती रहे तो देश में कई देवेंद्र पैदा हो सकते हैं।”

2004 में अर्जुन अवार्ड और 2012 में पद्मश्री से नवाजे जा चुके देवेंद्र को भारत में शायद अन्य लोकप्रिय खेलों के खिलाड़ियों जैसी शोहरत नहीं मिली। हालांकि झाझरिया का मानना है कि पैरा खिलाड़ियों के प्रति अब देश में नजरिया बदल रहा है।

उन्होंने कहा, “पैरा-एथलीटों के प्रति नजरिया धीरे-धीरे बदल रहा है। इसके पीछे पैरा एथलीटों का शानदार प्रदर्शन है, जिन्होंने न सिर्फ पैरालम्पिक में बल्कि विश्व चैम्पियनशिप में भी शानदार प्रदर्शन किया।”

झाझरिया ने कहा कि भारत लौटने के बाद ही वह अब अपने भविष्य के बारे में सोचेंगे।

उन्होंने कहा, “मैं 21 सितंबर को भारत लौट रहा हूं और तभी मैं अपने कोच से अपने भविष्य पर विचार-विमर्श करूंगा। अगर वह कहते हैं कि बतौर खिलाड़ी मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं तो मैं अभी बतौर खिलाड़ी ही खेलों में सक्रिय क्यों नहीं रह सकता?”

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