अहमदाबाद, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। सोमवार को आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच हुए कबड्डी के एशेज मुकाबले में इंग्लैंड के रेडर टोपे एडेलवाल्योर दूसरे मिनट में आस्ट्रेलियाई खेमे में घुसे और दो रेड अंक लेकर वापस आए। पहले हाफ की समाप्ति तक टोपे ने सुपर-10 हासिल कर लिया था और जब तक उनकी टीम यह मुकाबला 69-25 से जीतती, तब तक वह अपने खाते में कुल 22 अंक डाल चुके थे, जिनमें से 20 अंक सफल रेड से जुटाए गए थे।
अहमदाबाद, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। सोमवार को आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच हुए कबड्डी के एशेज मुकाबले में इंग्लैंड के रेडर टोपे एडेलवाल्योर दूसरे मिनट में आस्ट्रेलियाई खेमे में घुसे और दो रेड अंक लेकर वापस आए। पहले हाफ की समाप्ति तक टोपे ने सुपर-10 हासिल कर लिया था और जब तक उनकी टीम यह मुकाबला 69-25 से जीतती, तब तक वह अपने खाते में कुल 22 अंक डाल चुके थे, जिनमें से 20 अंक सफल रेड से जुटाए गए थे।
अहमदाबाद स्थित द एरेना बाय ट्रांसस्टेडिया में जारी कबड्डी विश्व कप-2016 के शुरुआती चार दिनों में हमने देखा है कि कमजोर टीमों के खिलाफ 50 से 60 के बीच स्कोर बन रहा है। ईरान और भारत जैसी टीमें ऐसा करने में आगे रही हैं। ईरान ने अब तक दो मैचों में सबसे अधिक 57 रेड अंक जुटाए हैं।
ऐसा नहीं है कि अगर दो कमजोर टीमें खेल रही हैं तो सफल रेड की संख्या में कमी देखी गई है। मसलन पोलैंड और केन्या के बीच हुए मुकाबले का परिणाम 54-48 से केन्या के पक्ष में रहा और इस मैच में शायद ही कोई नाकाम रेड देखा गया हो।
अब तक हुए मुकाबलों में रेडरों ने शानदार खेल का प्रदर्शन किया है, ऐसा भी नहीं है। यह दरअसल डिफेंस की नाकामी के कारण हुआ है। चाहे वो प्रो कबड्डी हो या फिर अंतर्राष्ट्रीय कबड्डी, फॉर्मेट एक होने के कारण दोनों में डिफेंस की अहम भूमिका होती है। यह किसी टीम की जीत का कारण बनता है। एक अच्छी डिफेंसिव इकाई खड़ा करने की कला सीखने के लिए कम से कम दो महीने लगते हैं।
किसी टीम का डिफेंस अच्छा है, इसका निर्धारण सिर्फ इसी बात से नहीं हो सकता कि उसे राइट और लेफ्ट कार्नर पर काफी तेजी से मूव करने वाले और मजबूती से एक-दूसरे की बांह थामे रहने वाले खिलाड़ी हैं। डिफेडरों की सफलता काफी हद तक उनके बीच के सामंजस्य पर निर्भर करती है। यह सामंजस्य कठिन अभ्यास और अनुभव के बाद आता है।
कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने डिफेंस में बेहतरीन सामंजस्य के कारण शानदार सफलता हासिल की है। फैजल अतराचली, रवींदर पहल, मोहित चिल्लर और सुरेंदर नड्डा, ये खिलाड़ी इसलिए अपनी एक अलग मुकाम बना सके हैं क्योंकि इन्होंने एक अच्छे डिफेंस के लिए जरूरी मानकों पर चलना सीखा और उसे मैट पर लागू किया।
अब एक सवाल उठता है कि आखिरकार प्रो कबड्डी लीग के सीजन-4 में बड़े स्कोर वाले मैच क्यों नहीं हुए। इस लीग में सभी टीमें संतुलित हैं और डिफेंस का काम देखने वाले खिलाड़ी अपनी भूमिका को अच्छी तरह समझते हैं। एसे में अगर अनूप कुमार और काशीलिंग अदाके जैसे खिलाड़ी भी किसी टीम के पास हैं तो वह 20 या फिर 30 से अधिक अंक नहीं हासिल कर पाती है। पीकेएल-4 में हुए 60 मैचों में से सिर्फ छह ऐसे हुए, जिनका स्कोर 40 के पार गया।
पीकेएल-2 की विजेता यू मुंबा को सीजन-4 में सिर्फ इसलिए संघर्ष करना पड़ा क्योंकि उसके पास अच्छे डिफेंडरों की कमी थी। ऐसे में यह बात निकलकर सामने आई है कि विश्व कप हो या प्रो कबड्डी, डिफेंडरों को अहम भूमिका निभानी होती है लेकिन अहमदाबाद में अब तक तो कम से कम रेडरों की तूती बोलती दिख रही है।
गुलजार की गजलों या फिर किवी रग्बी की तरह डिफेंसिव मूव देखने या सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन इसे बनाना काफी कठिन है। अमेरिका, पोलैंड और आस्ट्रेलिया जैसी टीमों के पास मांसपेशियों की शक्ति की कमी नहीं है लेकिन डिफेंस की कला इन्हें समय के साथ ही आएगी। यह कला खेल में साथ-साथ काफी वक्त बिताने और एक बेहतर सामंजस्य कायम करने के बाद आती है।
विश्व कप में हिस्सा ले रहीं कमजोर टीमें जब अपने देश लौटेंगी तो उनके खिलाड़ी अपने-अपने पेशेवर कार्यो में जुट जाएंगे। कुछ या सारे अभ्यास में रहेंगे, लेकिन उसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाएगा। ऐसे में डिफेंस का स्तर ठीक नहीं हो सकता। अगर ये टीमें यह सोचती हैं कि मांसपेशियों की ताकत के दम पर वे दो महीने के अभ्यास के बाद एक बेहतर सामंज्य वाला डिफेंस लाइन तैयार कर सकती हैं तो ये उनकी भूल है। इसके लिए सतत मेहनत की जरूरत है।
dharmpath.com dharmpath