पिछले कुछ दिनों में भारत में दो बड़े भारतीय राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल की सज़ा सुना दी गई।
इसके बाद भारत में फिर से भ्रष्टाचार की समस्या पर बहस शुरू हो गई।
भ्रष्टाचार आज भारत के सामने खड़ी बेहद गम्भीर समस्याओं में से एक है। ट्राँसपेरेन्सी इण्टरनेशनल द्वारा दुनिया भर के देशों में फैले भ्रष्टाचार के स्तर पर इन देशों की जो सूची बनाई गई है, उसमें शामिल कुल 176 देशों में से भारत 94 वें नम्बर पर है। भारत में विभिन्न स्तरों के राजनीतिज्ञ घरेलू राजनीति के एक मुख्य सवाल के रूप में बीच-बीच में इस सवाल को उठाते हैं। लेकिन फिर भी हालत जैसी की तैसी है। देश में भ्रष्टाचार कम होने की जगह बढ़ता जा रहा है। रेडियो रूस के विशेषज्ञ और रूस के सामरिक अध्ययन संस्थान के एक विद्वान बरीस वलख़ोन्स्की ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा :
ज़रा याद करें कि कैसे अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने दो साल पहले सारे भारत को झंझोड़ कर रख दिया था। उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अपना यह आन्दोलन अकेले ही शुरू किया था, लेकिन बाद में उनके साथ लाखों लोग आ मिले थे और ऐसा लग रहा था कि पूरा समाज ही भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हुआ है। लेकिन उस आन्दोलन का कोई असर नहीं हुआ। अन्ना हजारे ने अपने आन्दोलन के आधार पर कोई राजनीतिक दल बनाना नहीं चाहा। उनके सहयोगी अरविन्द केजरीवाल ने जो ‘आम आदमी पार्टी’ बनाई, वह भारत के राजनीतिक जीवन को ज़्यादा प्रभावित नहीं कर पाई। अन्ना हज़ारे का वह लोकप्रिय आन्दोलन कहीं हवा में गुम हो गया। उस आन्दोलन में शामिल कुछ कार्यकर्ताओं को उससे थोड़ा-बहुत फ़ायदा ज़रूर हुआ, लेकिन उससे समाज में कोई वास्तविक बदलाव नहीं हुआ।
इसी साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय दिया था, जिससे परिस्थिति कुछ बेहतर होनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि जिन संसद सदस्यों और राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध दो साल से अधिक की सज़ा मिली है, उन्हें अपना पद छोड़ना होगा। लेकिन इस निर्णय में भी विरोधाभास यह है कि क्या अभी तक अदालत में भ्रष्टाचार करने के अपराध में सज़ा पाने के बाद भी राजनीतिज्ञ अपने पदों पर बने रहते थे?
सितम्बर के अन्त में देश में एक बड़ा हंगामा पैदा हो गया। हाईकोर्ट का निर्णय आने के बाद सरकार ने शुरू में हाईकोर्ट के निर्णय को कोई अहमियत नहीं दी और राजनीतिज्ञों व संसद सदस्यों को बचाने की कोशिश की गई। लेकिन काँग्रेस के नेता राहुल गाँधी ने, जिन्हें 2014 के आम चुनाव के बाद प्रधानमन्त्री पद का प्रत्याशी माना जा रहा है, सरकार की इस हरकत को ‘बेवकूफ़ी’ बताया। बरीस वलख़ोन्स्की ने कहा :
सचमुच अगर ठीक से सोचा जाए तो ऐसा करना एक बेवकूफ़ी ही है। लेकिन यह जानने की बड़ी इच्छा है कि भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को बचाने की तजवीज़ को काँग्रेस के नेताओं और विपक्षी नेताओं की क्या राय रही होगी। राहुल गाँधी के कथन को मनमोहन सिंह की बदनामी माना जा रहा है। और इस बदनामी की ओर संकेत किया है, भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने। दिल्ली की जनसभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा — जब प्रधानमन्त्री के साथ घर में ऐसा व्यवहार किया जाता है तो दूसरे देशों में उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाएगा।
न्यूयार्क से वापिस लौटे प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को बुधवार को देश के प्रमुख राजनीतिज्ञों के साथ तुरन्त मुलाक़ात करनी पड़ी। इन लोगों नें राहुल गाँधी और भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी शामिल हैं।
इस वातावरण में भारत के दो प्रमुख राजनीतिज्ञों राज्यसभा के सदस्य और पूर्व मन्त्री रशीद मसूद तथा बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री और संसद सदस्य लालू प्रसाद यादव को अदालत ने भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप में क़ैद की सज़ा दे दी। बरीस वलख़ोन्स्की ने आगे कहा :
काँग्रेस पार्टी के संचालकों के प्रति राजीव गाँधी का यह विद्रोह परिस्थिति को दूसरी नज़रों से देखने पर बाध्य करता है। आज की परिस्थिति में ‘भ्रष्टाचार’ शब्द उन पुराने नेताओं से ज़्यादा जुड़ा हुआ लगता है, जो भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। शायद चुनाव से पहले काँग्रेस इस बात की ओर ही इशारा करना चाहती थी ताकि जनता यह समझ जाए कि भ्रष्टाचार पुराने नेता करते थे।
लेकिन मुख्य सवाल अभी भी अपनी जगह पर बना हुआ है कि चुनाव के बाद क्या होगा, चाहे जीत किसी की भी हो काँग्रेस की या विपक्ष की? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि सत्ता पर काबिज़ होने के बाद आज जो लोग भ्रष्टाचार की आलोचना कर रहे हैं, कल वे ही लोग किसी ने किसी घोटाले में शामिल हों?from dw.de
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