बुंदेलखंड के सैकड़ों परिवार पलायन की तैयारी में

झांसी, 31 जनवरी (आईएएनएस)। झांसी-लखनादौन राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसे सिमरिया गांव के आदिवासी परिवारों के टेकनपुर मजरा में न तो चुनावी चर्चा है और न ही यहां के लोगों में किसी नेता व उम्मीदवार के बारे में जानने की जिज्ञासा, उन्हें तो सिर्फ उस संदेशे का इंतजार है जो उन्हें देश के किसी भी हिस्से में रोजगार का इंतजाम करा सके।

झांसी, 31 जनवरी (आईएएनएस)। झांसी-लखनादौन राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसे सिमरिया गांव के आदिवासी परिवारों के टेकनपुर मजरा में न तो चुनावी चर्चा है और न ही यहां के लोगों में किसी नेता व उम्मीदवार के बारे में जानने की जिज्ञासा, उन्हें तो सिर्फ उस संदेशे का इंतजार है जो उन्हें देश के किसी भी हिस्से में रोजगार का इंतजाम करा सके।

बुंदेलखंड में रोजगार एक बड़ी समस्या रही है, यही कारण है कि यहां से बड़ी संख्या मंे मजदूर दिल्ली, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा आदि राज्य में काम के लिए जाते हैं, अधिकांश निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं, मगर नोटबंदी के कारण निर्माण कायरें पर पड़े असर के चलते कई परिवारों को लौटना पड़ा, वहीं कई परिवार मकर संक्रांति के मौके पर अपने गांव आए थे।

मनोहर (28) पिछले दिनों ही झांसी के दूसरे हिस्से गुरसरांय से परिवार सहित काम से लौटा है, वह कहता है कि गांव आया है मगर उसके पास कोई काम नहीं है, वह कहीं भी जाकर काम करने को तैयार है, जिस दिन भी ठेकेदार का फोन आ जाएगा, वह उसी दिन अपने परिवार के साथ काम के लिए निकल पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए सात चरणों में मतदान हो रहा है, बुंदेलखंड की 19 सीटों पर 23 फरवरी को मतदान होना है। मनोहर वोट के अधिकार से वाकिफ है, मगर सवाल करता है कि अपना और परिवार का पेट भरने लिए तो काम चाहिए, काम यहां है नहीं, लिहाजा मतदान से पहले काम मिल गया तो वह चला जाएगा।

इसी गांव की सरस देवी भी काम न होने की शिकायत दर्ज कराती है। वह कहती है कि गांव में सुविधाएं नहीं हैं, रोजगार के मौके नहीं हैं, ऐसे में काम करने बाहर जाना होता है, अभी काम नहीं था इसलिए गांव आ गए और जैसे ही काम के लिए बुलावा आएगा, वे लोग चले जाएंगे।

गांची खेड़ा में परचून दुकान चलाने वाले श्रीप्रसाद कुशवाहा बताते हैं कि बुंदेलखंड में रोजगार के लिए कोई बड़ा संयंत्र नहीं है, जो छोटे संयंत्र है उनमें गिनती के लोगों को रोजगार मिल पाता है। खेती अच्छी है नहीं लिहाजा बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार के लिए पलायन करना पड़ता है। अभी बड़ी संख्या में लोग गांव मंे नहीं है, वहीं कई जाने की तैयारी में हैं।

सिमरिया गांव के महेश पाल का दावा है कि काम की तलाश में कई गांव से 40 से 60 प्रतिशत तक परिवार पलायन कर गए हैं, कई परिवारों में तो आलम यह है कि उनके यहां सिर्फ बुजुर्ग और बच्चे ही यहां बचे हैं। कुछ परिवार मकर संक्रांति पर गांव आए, वे भी अब जाने की तैयारी में हैं।

बुंदेलखंड में काम की तलाश में पलायन कर चुके परिवार और अब रोजगार के संदेशे पर बाहर जाने को तैयार बैठे लोगों के चलते विधानसभा चुनाव के मतदान प्रतिशत पर असर पड़ने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

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