स्त्रियां अब सिर्फ ‘किचन’ की बात नहीं करतीं : डॉ. उषा किरण खान (साक्षात्कार)

पटना, 10 फरवरी (आईएएनएस)। हिंदी और मैथिली की जानी-मानी लेखिका और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. उषा किरण खान का मानना है कि अब स्त्रियां सिर्फ किचन की ही बात नहीं करतीं, बल्कि उनमें साहित्य के प्रति भी अभिरुचि बढ़ी है।

पटना, 10 फरवरी (आईएएनएस)। हिंदी और मैथिली की जानी-मानी लेखिका और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. उषा किरण खान का मानना है कि अब स्त्रियां सिर्फ किचन की ही बात नहीं करतीं, बल्कि उनमें साहित्य के प्रति भी अभिरुचि बढ़ी है।

मैथिली में चार उपन्यास, चार नाटक, एक कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह की लेखिका उषा किरण खान ने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में कहा कि स्त्रियों में पढ़ने की ललक पुरुषों के बाद जागी और जब से स्त्रियों ने पढ़ना शुरू किया, अपनी बात भी रखने लगी हैं। उनका दावा है कि पुरुष से ज्यादा सृजनशील स्त्री होती है।

उनका कहना है, “स्त्रियों ने लेखनी के माध्यम से जो भी व्यक्त किया, वह उनकी भावना है। स्त्रियों की रचना में कल्पनाशीलता कम, भोगा हुआ यथार्थ ज्यादा होता है।”

पटना पुस्तक मेले में पहुंचीं उषा किरण ने स्त्री और पुरुष साहित्यकारों में अंतर के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि दोनों में कोई अंतर नहीं है। दोनों की दृष्टि में अंतर जरूर है। स्त्रियों के लेखन में उनकी संवेदनाएं गहराई से उभरती हैं।

पद्मश्री सम्मान के लिए चुनी जाने के प्रश्न पर उषा कहती हैं कि कोई पुरस्कार मिलने से खुशी जरूर होती है, लेकिन उससे रचनात्मकता पर कोई असर नहीं पड़ता। इसलिए साहित्यकार पुरस्कारों को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। साहित्यकार तो बस अपनी धुन में लिखते चले जाते हैं।

बचपन से ही लेखन में रुचि रखने वाली उषा बताती हैं, “लिखने की रुचि बचपन से थी। स्कूल के विभिन्न कार्यक्रमों में भी लिखने का मौका मिलता रहा। बाद में बाबा नागार्जुन ने उत्साहित किया। उन्होंने कहा, तुम अच्छा लिखती हो। इसके बाद मैं कविताएं लिखने लगी और बाबा के साथ कई स्थानों पर जाकर कविता पाठ करने का मौका भी मिला।”

उन्होंने बताया, “12वीं कक्षा के बाद तो साहित्य में और रुचि बढ़ी, फिर बढ़ती ही चली गई।”

उषा किरण खान कल्चरल हिस्ट्री में पीएचडी कर चुकी हैं। वह बी.एड. कॉलेज (मगध विश्वविद्यालय) में एंसिएंट हिस्ट्री एंड एशियन स्टडीज की विभागाध्यक्ष पद से साल 2005 में सेवानिवृत्त हुईं।

उषा की झोली में साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई पुरस्कार आ चुके हैं। 1988 में आए भूकंप की पृष्ठभूमि पर आधारित उनका मैथिली उपन्यास ‘हसीना मंजिल’ काफी चर्चित हुआ है।

दरभंगा में जन्मीं उषा किरण महिला चरखा समिति की अध्यक्ष रह चुकी हैं। इस समिति से महान स्वतंत्रता सेनानी लोकनायक जयप्रकाश नारायण और उनकी पत्नी प्रभावती भी जुड़ी रही हैं।

पटना पुस्तक मेला के विषय मंे पूछे जाने पर वह कहती हैं कि ऐसे मेले से साहित्यकारों को काफी लाभ पहुंचता है। यहां कई प्रकाशक एक स्थान पर आते हैं। उषा कहती हैं, “मैं इतिहास की विद्यार्थी रही हूं, इस कारण इतिहास पर लिखना ज्यादा भाता है, लेकिन सामाजिक विषयों को टटोलना भी पसंद है।”

आज के साहित्य में बाजारवाद के प्रवेश पर चिंता जताते हुए उषा ने कहा, “आज बाजारवाद का ज्यादा प्रभाव है। किस लेखक की कितनी किताबें बिकीं, इस आधार पर लेखन का मूल्यांकन किया जा रहा है, जो सही नहीं है। इससे कमोबेश नुकसान साहित्य का ही होना है। स्तरहीन किताबें अगर ज्यादा बिकें, तो क्या उसे उत्कृष्ट साहित्य मान लिया जाएगा? नहीं न!”

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