रायपुर, 26 मार्च (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के कृषि वैज्ञानिकों ने 100 दिनों में पकने वाली कुसुम (बर्रे) की दो नई किस्में विकसित की हैं। इसमें एक कांटे वाली और दूसरी बिना कांटे वाली किस्म है।
रायपुर, 26 मार्च (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के कृषि वैज्ञानिकों ने 100 दिनों में पकने वाली कुसुम (बर्रे) की दो नई किस्में विकसित की हैं। इसमें एक कांटे वाली और दूसरी बिना कांटे वाली किस्म है।
विभाग के वैज्ञानिक डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने कुसुम की दो नई किस्में विकसित करने में मुख्य योगदान दिया है। वह इस समय अखिल भारतीय समन्वित कुसुम अनुसंधान परियोजना में कार्य कर रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि वर्तमान में कुसुम की जो किस्में किसान लगा रहे हैं, वे 145 से 150 दिनों में पककर तैयार होती हैं। कुसुम की बुआई के लिए अक्टूबर महीने का मध्य समय उपयुक्त होता है। छत्तीसगढ़ की परिस्थितियों में धान फसल कटने के बाद रबी की बोआई सामान्यत: देरी से शुरू होने की स्थिति में कुसुम की बोआई दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक की जाती है।
कुसुम की नई किस्मों की बुआई देरी से होने पर भी किसानों के लिए फायदेमंद है। वैज्ञानिकों ने बताया कि कुसुम का तेल दिल के मरीजों के लिए लाभदायक होता है। इसके फूल की पंखुड़ियों से हर्बल चाय बनती है और यह चाय घुटनों के दर्द के लिए लाभकारी होती है।
नई किस्मों को आरएसएस 2011 और आरएसएस 2014 नाम दिया गया है। आरएसएस 2011 छिड़का बोआई के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। इनकी कतार बोनी भी की जा सकती है। कुसुम की प्रचलित किस्मों की बोआई देरी से होने से उत्पादन प्रभावित होता है। इनकी तुलना में कुसुम की यह किस्म छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त बताई जा रही है।
किसान धान की कटाई के बाद एक जुताई करके नई किस्मों की छिड़का पद्धति से बोआई कर सकते हैं। एक एकड़ रकबे में मात्र चार किलोग्राम बीज पर्याप्त होगा। इस किस्म के बीज में 26 प्रतिशत तेल होता है।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि दूसरी किस्म आरएसएस 2014-11 सफेद फूलों और अधिक शाखाओं वाली किस्म है। इसके बीजों में तेल की मात्रा 33 प्रतिशत होती है।
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