देश में उभरती एक नई शख्सियत

ये भारतीय लोकतंत्र की खूबी है जो करोड़ों की भीड़ में एक चेहरा उभरता है और राजनीति में सबसे लंबी लकीर खींच देता है। कुछ ऐसी ही लकीर 2014 के आम चुनावों में खिंची थी और पूरा देश ‘मोदी-मोदी’ करने लगा। लेकिन महज तीन वर्षो में ही 18 मार्च को एक शख्सियत, एकाएक उभरी और देश ‘योगी-योगी’ करने लगा!

ये भारतीय लोकतंत्र की खूबी है जो करोड़ों की भीड़ में एक चेहरा उभरता है और राजनीति में सबसे लंबी लकीर खींच देता है। कुछ ऐसी ही लकीर 2014 के आम चुनावों में खिंची थी और पूरा देश ‘मोदी-मोदी’ करने लगा। लेकिन महज तीन वर्षो में ही 18 मार्च को एक शख्सियत, एकाएक उभरी और देश ‘योगी-योगी’ करने लगा!

क्या भारतीय लोकतंत्र प्रयोगधर्मी है, जो समय गंवाने में बिल्कुल रुचि नहीं रखता? या फिर मुद्दों पर राजनीति पहली पसंद हो गई है? लगता नहीं कि वो दिन आ गए हैं, जब आश्वासन नहीं, एजेंडे पर अमल, लोकतंत्र में सफलता का फॉर्मूला होगा।

सवाल उठने लगा है कि कहीं मौजूदा राजनीति के मायने बदल गए हैं? या बदलने की शुरुआत हो चुकी है? मतलब यह कि वो दिन लद गए, अब क्रियान्वयन में देरी नहीं, तुरंत दिखने वाले परिणामों से व्यावहारिक राजनीति होगी। इसका मार्ग, राष्ट्रधर्म और राजधर्म के बीच से, लेकिन गहरा और साफ होकर गुजरेगा। क्या शुरुआत हो भी चुकी है? क्योंकि कहीं न कहीं अनजाने ही सही, प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में बनी विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी में गुपचुप ‘ध्रुवीकरण’ तो नहीं शुरू हो गया है?

देश में वर्ष 2019 के आम चुनाव तक लोकप्रियता का पैमाना मापने के लिए भविष्य में होने वाले स्थानीय और कुछ प्रदेशों के चुनाव साफ कर देंगे कि लोकतंत्र की अगली पसंद क्या है?

बहरहाल, अभी सब बातें केवल कयास हैं। इस बीच सबको दिख रहा है कि देशी-विदेशी मीडिया में भारत के सबसे बड़े सूबे के संन्यासी मुख्यमंत्री की चर्चा सुर्खियों में है। एक ओर खुद को फकीर बताने वाले प्रधानमंत्री हैं तो दूसरी ओर भीख नहीं देने वाले साधु-संतों को सूबा ही भीख में दे दिए जाने की बात कहने वाले मुख्यमंत्री।

साफ है कि 2019 के आम चुनाव के लिए भाजपा ने अपनी जमीन तैयार कर ली है। चेहरा कहें या व्यक्ति विशेष, उसके दम पर सत्ता में आए इस दल ने लोकप्रियता के सारे शीर्ष को बहुत तेजी से छुए और कयासों को धता भी बताया। कालाधन, नोटबंदी जैसी चुनौतियों और कठिन फैसलों के भ्रम में उलझे दूसरे दलों को पटखनी देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर एक अपराजेय योद्धा के रूप में उभरे।

लेकिन उप्र में जिस तर्ज पर 10 दिन से भी ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद बिना कैबिनेट मीटिंग, योगी ने जितने भी फैसले या आदेश दिए, उससे उनकी ‘फायर ब्रांड’ छवि और भी चमकदार हुई है।

इससे यह संदेश पूरे देश में जा रहा है कि बात भले ही हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता की हो, लेकिन योगी के इरादे बेहद साफ हैं, जो हकीकत में बदलते दिख रहे हैं। सीधे-सीधे कहें तो जो करना है, उसमें देर नहीं, जो कहना है उसे करना ही फॉर्मूला होगा।

ऐसा नहीं कि उप्र में भाजपा की यह पहली सरकार है। योगी के मुख्यमंत्री बनने से पहले गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, असम, गोवा और उत्तराखंड में भाजपा की राज्य सरकारें हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की गठबंधन सरकार है।

हां, फर्क इतना है कि जिस तर्ज पर उप्र में योगी आदित्यनाथ काम कर रहे हैं, उसका साफ संकेत है कि वो इन सबसे इतर जरूर हैं। योगी के काम से संघ की बाछें खिली हुई हैं और देश के लिए संघ का चेहरा कौन होगा, कहने की आवश्यकता नहीं।

बात चाहे अवैध बूचड़खाने की हो, या मजनूं-विरोधी अभियान की या फिर फलाहार पार्टी हो या नकल माफिया पर नकेल, सरकारी दफ्तरों में साफ-सफाई, स्वच्छता पर सख्ती और पान-गुटके पर प्रतिबंध, इसे पूरे देश ने सराहा। बिना किसी झिझक या धर्मसंकट के, जिस बेबाकी और पारदर्शिता से उप्र में योगी सरकार ने कामकाज शुरू किया है, उसकी देखा देखी उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी अवैध बूचड़खानों पर गाज की शुरुआत हुई है।

लगता है, योगी फॉर्मूला अब भाजपा की पसंद बनता जा रहा है। गुरुग्राम में शिवसेना ने बूचड़खानों को बंद कराकर ‘योगी इफेक्ट’ दिखाया, यानी योगी की वाहिनी के अलावा संघ और सेना भी उनके साथ हमकदम दिख रही है।

जिस तेजी से, साफ-सुथरे, पारदर्शी एजेंडे के साथ, बेलाग अंदाज में योगी काम कर रहे हैं, उसने महज शब्दों की बाजीगरी से राजनीति साधने वालों को हैरान, परेशान कर दिया होगा। बहुमत और जनाधार को ही हथियार बनाकर योगी आदित्यनाथ राजनीति की नई इबारत गढ़ रहे हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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