पटना, 27 जुलाई (आईएएनएस)। जनता दल (युनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने गुरुवार को छठी बार बिहार की सत्ता पर काबिज हुए हैं, मगर इस बार भाजपा को साथ लेकर। राजनीति जीवन में अपनी छवि के प्रति जागरूक रहने वाले तथा भ्रष्टाचार को लेकर ‘जीरों टॉलरेंस’ की नीति के अगुआ माने जाने वाले नीतीश की पहचान साफ-सुथरी छवि के कारण ही ‘सुशासन बाबू’ की रही है।
पटना, 27 जुलाई (आईएएनएस)। जनता दल (युनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने गुरुवार को छठी बार बिहार की सत्ता पर काबिज हुए हैं, मगर इस बार भाजपा को साथ लेकर। राजनीति जीवन में अपनी छवि के प्रति जागरूक रहने वाले तथा भ्रष्टाचार को लेकर ‘जीरों टॉलरेंस’ की नीति के अगुआ माने जाने वाले नीतीश की पहचान साफ-सुथरी छवि के कारण ही ‘सुशासन बाबू’ की रही है।
राजभवन के राजेंद्र मंडप में आयोजित एक समारोह में बिहार के राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी ने नीतीश को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई।
नीतीश ने गुरुवार को बिहार का छठी बार कमान संभाला है। नीतीश इसके पूर्व तीन मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक, 24 नवंबर 2005 से 24 नवंबर 2010 तक, 26 नवंबर 2010 से 19 मई 2014 तक, 22 फरवरी 2015 से 19 नवंबर 2015 और 20 नवंबर 2015 से वर्तमान तक बिहार की कमान संभाल चुके हैं।
नालंदा के कल्याणबिगहा गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी कविराज रामलखन सिंह और परमेश्वरी देवी के घर 1 मार्च 1951 को जन्मे नीतीश की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती गई उनका झुकाव राजनीति की ओर बढ़ते गया। पटना के बख्तियारपुर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले नीतीश वर्ष 1974 में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े और उसी वर्ष आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा) के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान उन्होंने समता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।
बिहार अभियांत्रिकी महाविद्यालय से उन्होंने विद्युत अभियांत्रिकी में उपाधि हासिल की। 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा की सीढ़ियों पर बतौर विधायक कदम रखा। 1987 में वे युवा लोकदल के अध्यक्ष बने तथा 1989 में उन्हें बिहार में जनता दल का सचिव चुना गया।
इस दौर में वर्ष 1989 में ही नीतीश नौवीं लोकसभा के सदस्य भी चुने गए। अब तक नीतीश की देश में सफल नेता के रूप में पहचान बन गई थी। यही कारण है कि वर्ष 1990 में पहली बार उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में बतौर कृषि राज्यमंत्री शामिल किया गया।
वर्ष 1991 में वे एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने गए और उन्हें जनता दल का राष्ट्रीय सचिव तथा संसद में जनता दल का उपनेता बनाया गया।
बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र का नीतीश ने वर्ष 1989 और वर्ष 2000 में प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1998-1999 में कुछ समय के लिए नीतीश को केंद्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री का दायित्व भी सौंपा गया, लेकिन अगस्त 1999 में हुई एक रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
नीतीश तीन मार्च 2000 को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उन्हें सिर्फ सात दिन के अंदर ही त्याग पत्र देना पड़ा।
इसके बाद नीतीश की काबलियत को देखते हुए उन्हें एक बार फिर केंद्रीय कृषि मंत्री का दायित्व सौंपा गया। मई 2001 से 2004 तक वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेलमंत्री का भी दायित्व संभाला। रेलमंत्री के तौर पर नीतीश के लिए गए फैसलों को लोग आज भी याद करते हैं।
नीतीश 24 नवंबर, 2005 को दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 15 वर्ष के शासनकाल को अपनी साफ-सुथरी छवि से धाराशायी करना आसान नहीं था, लेकिन बिहार के मतदाताओं को नीतीश में ‘सुशासन बाबू’ की छवि दिखाई दी। इस दौरान नीतीश अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, कर्मठ फैसले और बेदाग नेतृत्च से बिहार को विकास के पथ पर आगे ले गए।
अपने विकास मॉडल के कारण नीतीश कुमार की पहचान विश्वस्तर पर बनी। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने विकास को अपना एजेंडा बनाया। वर्ष 2010 में विशाल बहुमत से जीतकर बिहार की बागडोर संभालने वाले नीतीश ने पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में मिली पार्टी की करारी हार के बाद 17 मई 2014 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 22 फरवरी 2015 को एक बार फिर मुख्यमंत्री बने नीतीश ने अपने काम के आधार पर विधानसभा चुनाव में उतरे।
जनता दल (युनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस महागठबंधन ने नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और महागठबंधन को भारी जीत मिली, लेकिन 20 महीने के बाद ही काम करने में असहज महसूस करने के बाद नीतीश ने 26 जुलाई को महागठबंधन से नाता तोड़ दिया और इस्तीफा दे दिया और एकबार फिर भाजपा के साथ मिलकर बिहार की सत्ता संभाल ली।
बिहार में नीतीश की पहचान न्याय के साथ सुशासन का राज्य स्थापित करने की रही है, यह कारण है कि उनके चाहने वाले लोगों ने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ का नाम दिया। उन्होंने भी अपना मूलमंत्र ‘न्याय के साथ विकास’ को बनाया।
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