नई दिल्ली, 25 नवंबर (आईएएनएस)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गर्वनर वाई. वी. रेड्डी ने शनिवार को कहा कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की प्रमुख समस्या सरकारी प्रतिभूतियों में अपनी जमा राशि का 25-30 फीसदी निवेश करने का बोझा है।
रेड्डी ने यहां टाइम्स लिट फेस्ट 2017 के एक संवाद सत्र में कहा, “भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की वास्तविक समस्या सरकारी प्रतिभूतियों में अपनी जमा राशि का 25-30 फीसदी निवेश करने का बोझ है। दुनिया में कहीं भी इतना बड़ा बोझ नहीं डाला जाता है।”
उन्होंने कहा, “दूसरी, कई अन्य बाध्यताएं भी हैं। तो आपको प्रणाली को संपूर्णता से देखना हो। लेकिन जहां तक गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों या एनपीए (फंसे हुए कर्जो) का सवाल है, एनपीए तभी एक समस्या बनती है, जब इसका बोझ करदाताओं पर डाला जाता है।”
रेड्डी ने विस्तार से कहा कि एनपीए का मतलब यह नहीं है कि रकम बैंक से लूट ली गई है।
उन्होंने कहा, “एनपीए का मतलब यह नहीं है कि कोई धन चुरा रहा है। अगर आईसीआईसीआई बैंक या एचडीएफसी बैंक में एनपीए की समस्या होती है तो वह नुकसान शेयरधारकों को वहन करना होता है।”
अपनी आत्मकथा ‘एडवाइस एंड डिस्सेंट : माई लाइफ इन पब्लिक सेक्टर’ का हवाला देते हुए रेड्डी ने कहा कि एनपीए एक बड़ी समस्या इसलिए बन गया है, क्योंकि देश की कानूनी व्यवस्था में कर्जदारों से रकम की वसूली के लिए उचित प्रावधानों की कमी है।
उन्होंने कहा, “कानूनी रूप से बैंकों के पास अपनी रकम की वसूली का कोई रास्ता नहीं है। हाल तक ऐसा था, लेकिन अब अच्छी बात यह हुई है कि दिवालिया संहिता लाई गई है। अभी (बैंकिंग क्षेत्र में) कई सारे बुनियादी बदलाव हो रहे हैं।”
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