नई दिल्ली, 22 अगस्त (आईएएनएस)। कांग्रेस ने गुजरात सरकार के बिजली कंपनियों को राहत देने के लिए एक आयोग बनाने के कदम को लेकर बुधवार को मोदी सरकार पर हमला किया। कांग्रेस ने कहा कि इसका बोझ जनता पर पड़ेगा और यह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लंघन है।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा करते है कि वह उद्योगपतियों के साथ दिखने से डरते नहीं हैं, क्योंकि वह ईमानदार हैं। लेकिन हमने मित्र पूंजीवाद के कई उदाहरण देखे हैं।”
उन्होंने कहा कि फरवरी 2007 में गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (जीयूवीएनएल) ने तीन कंपनियों से 4850 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए एक पीपीए (बिजली खरीद समझौता) पर हस्ताक्षर किया था।
उन्होंने कहा कि समझौते में कहा गया कि तीनों कंपनियां गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब व हरियाणा को बिजली मुहैया कराएंगी।
जयराम रमेश ने कहा कि समझौते के अनुसार, बिजली का मूल्य 2.40 रुपये से 2.80 रुपये के बीच होना चाहिए।
कांग्रेस नेता ने कहा, “बिजली का उत्पादन 2007 में शुरू हुआ। पांच साल बाद 2012 में इन कंपनियों ने मूल्य बढ़ाने का आग्रह किया और सहमत मूल्य पर बिजली उत्पादन से इनकार कर दिया।”
उन्होंने कहा कि कंपनियों ने कहा कि वे सहमत मूल्य पर बिजली नहीं मुहैया करा सकतीं और उन्होंने एक आवेदन दिया।
उन्होंने कहा, “इस मामले पर पांच सालों से विभिन्न स्तरों पर राज्य व केंद्र में चर्चा हुई। इसके बाद आखिरकार मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 11 अप्रैल, 2017 के फैसले में कहा कि कंपनियों के आग्रह में कोई वैधता नहीं है।”
उन्होंने कहा, “फैसले के बाद गुजरात सरकार ने तीन जुलाई, 2018 को एक अधिसूचना जारी की, जिसमें कहा गया कि वह केंद्र सरकार के निर्देशों पर तीन सदस्यीय एक आयोग बनाएगी और तीन कंपनियों को कैसे राहत दी जाए, इस पर सुझाव मांगेगी।”
उन्होंने कहा, “यह अधिसूचना सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सीधे तौर पर उल्लंघन है। केंद्र व गुजरात सरकारों ने अदालत की अवमानना की है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि तीन सदस्यीय आयोग इन कंपनियों को राहत देने का सुझाव देता है तो गुजरात से बिजली खरीदने वाले पांचों राज्यों पर बोझ पड़ेगा।
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