सर्वोच्च न्यायालय का 7 रोहिंग्याओं के निर्वासन पर रोक से इनकार (लीड-1)

नई दिल्ली, 4 अक्टूबर (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को उन सात रोहिंग्याओं के निर्वासन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी, जिन्हें आज (गुरुवार ) ही म्यांमार भेजा जा रहा है। ये 2012 में भारत आए थे और असम के सिलचर में एक शिविर में रह रहे थे।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय कृष्ण कौल और न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ की पीठ ने प्रशांत भूषण की याचिका खारिज कर दी, क्योंकि केंद्र ने सूचित किया है कि म्यांमार ने इन रोहिंग्याओं को अपने नागरिकों के रूप में स्वीकार कर लिया है।

अदालत में केंद्र सरकार की पैरवी करते हुए अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सातों रोहिंग्याओं को अवैध प्रवासी होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। ये दोषी हैं और पहले ही अपनी सजा पूरी कर चुके हैं। इन लोगों ने खुद ही अपने देश जाने की इच्छा जताई थी।

केंद्र ने अदालत को बताया कि इन लोगों के अनुरोध पर विदेश मंत्रालय ने म्यांनमार के अधिकारियों से संपर्क किया और अधिकारियों ने इन रोहिंग्याओं के म्यांमार का नागरिक होने की पुष्टि और इन्हें वापस लेने की इच्छा जताई।

याचिकाकर्ता मोहम्मद सलीमुल्लाह की पैरवी करते हुए भूषण ने पीठ को बताया कि उसे ‘यूएन हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजीस’ (यूएनएचएसआर) से शरणार्थियों की इच्छा जानने के लिए उनका साक्षात्कार लेने के लिए कहना चाहिए, ताकि पता चल सके कि वे वापस जाना चाहते हैं या नहीं।

भूषण ने अदालत से कहा कि रोहिंग्याओं को वापस भेजने पर उन्हें (रोहिंग्याओं को) जान का खतरा हो सकता है।

उनके यह कहने पर कि रोहिंग्या लोगों की जीवन की सुरक्षा करना शीर्ष अदालत की जिम्मेदारी है, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “आपको हमें हमारी जिम्मेदारी याद दिलाने की जरूरत नहीं है, हम अपनी जिम्मेदारी जानते हैं।”

रोहिंग्या म्यांमार के राखाइन प्रांत में बसा अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय है।

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