‘नरवालों’ के खून में बसी है कबड्डी : दीपक नरवाल (साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 1 दिसम्बर (आईएएनएस)। प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) में नरवाल कुलनाम के खिलाड़ियों का जलवा रहा है। लीग के बीते संस्करणों की तरह इस सीजन में भी बड़ी संख्या में नरवाल मैट पर अपना जलवा दिखा रहे हैं। लीग के छठे सीजन में विभिन्न टीमों में नौ ‘नरवाल’ खेल रहे हैं।

नई दिल्ली, 1 दिसम्बर (आईएएनएस)। प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) में नरवाल कुलनाम के खिलाड़ियों का जलवा रहा है। लीग के बीते संस्करणों की तरह इस सीजन में भी बड़ी संख्या में नरवाल मैट पर अपना जलवा दिखा रहे हैं। लीग के छठे सीजन में विभिन्न टीमों में नौ ‘नरवाल’ खेल रहे हैं।

तीन बार की चैम्पियन और मौजूदा विजेता पटना पाटरेट्स की कमान तो खुद कप्तान प्रदीप नरवाल संभाल रहे हैं। प्रदीप के अलावा दीपक नरवाल, बिंटू नरवाल और प्रवीण नरवाल भी इस सीजन में पटना टीम का हिस्सा हैं।

पटना के अलावा दबंग दिल्ली में कप्तान जोगिंदर सिंह नरवाल और राजेश नरवाल, बंगाल वारियर्स में राकेश नरवाल और पुनेरी पल्टन में रिंकू नरवाल तथा संदीप नरवाल शामिल हैं।

पटना पाइरेट्स के रेडर दीपक नरवाल ने शनिवार को आईएएनएस से एक साक्षात्कार में कहा कि भारत में कबड्डी में नरवालों का अपना एक अलग ही इतिहास रहा है और मौजूदा दौर में जितने भी नरवाल खिलाड़ी लीग में और देश के लिए खेल रहे हैं वे सभी कहीं न कहीं उस इतिहास से प्रेरित हैं। दीपक के मुताबिक कबड्डी नरवालों के खून में बसी है।

दीपक ने कबड्डी में नरवालों के इतिहास को बयां करते हुए कहा, “कबड्डी में नरवालों के खेलने का इतिहास 1990 से ही चला आ रहा है। 1990 में चीन में जब पहला कबड्डी एशियाई खेल हुआ था, उसमें मेरे बड़े भाई ओमप्रकाश नरवाल स्वर्ण पकद जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा थे। उस समय मैं छोटा था इसलिए मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं है। लेकिन इतना पता है कि जब टीम स्वदेश लौटी थी तो गांव वालों ने बड़े भाई का जबर्दस्त स्वागत किया था।”

हरियाणा में सोनीपत जिले के रहने वाले दीपक ने कहा, “हमारे गांव और आसपास, इससे पहले कभी किसी का इतना बड़ा स्वागत नहीं हुआ था। इसके बाद यहां से एक रीत बन गई और गांव के लोगों को महसूस होने लगा कि उन्हें भी कबड्डी खेलनी चाहिए।”

उन्होंने कहा, “हमारे गांव के आसपास करीब 7-8 गांव नरवालों का ही है और तभी से इन गांवों में कबड्डी को प्राथमिकता दी जाने लगी।”

23 साल के दीपक, “गांव और जिले में कबड्डी को लेकर लोगों में उस समय और उत्साह बढ़ गया जब 1994 के कबड्डी एशियाई खेलों में मौजूदा समय में दबंग दिल्ली के कप्तान जोगिदर नरवाल के बड़े भाई सुरेंद्र नरवाल ने हिस्सा लिया था। जोगिदर के गांव के आसपास भी पूरा नरवालों का ही गांव है और वहां भी कबड्डी को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है।”

दीपक ने दूसरे सीजन में पटना पाटरेट्स से खेलते हुए लीग में पदार्पण किया था। वह तीसरे सीजन तक पटना की टीम में रहे और फिर इसके बाद उन्होंने दबंग दिल्ली तथा पांचवें सीजन में बंगाल वारियर्स का रूख किया था। दीपक अब फिर पटना टीम में लौट चुके हैं।

उन्होंने कहा, “1998 में मेरे चाचा और 2002 में मेरे पिता भी कबड्डी एशियाई खेल खेलकर आए थे। इसलिए कबड्डी में आने का हमारा इतिहास हमारे पूर्वजों से ही जुड़ा हुआ है। गावं और उसके आसपास करीब 500 बच्चे प्रतिदिन आपको कबड्डी खेलते दिख जाएंगे और इन 500 में से हर साल 20-30 बच्चों का चयन ऊंचे स्तर के लिए होता है।”

यह पूछे जाने पर कि लीग से जुड़ने के बाद आपके करियर में किस तरह का बदलाव आया है, दीपक ने कहा, “अब मेरे और मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई है। जब मैं पहली बार लीग में बिका था तो मुझे 2.5 लाख रूपये मिले थे। लेकिन इस सीजन में मुझे 57 लाख रूपये मिले हैं। इसके साथ मेरे खेल का काफी विकास हुआ है और मुझे फिर से एक नई पहचान मिली है।”

रेडर ने टीम के हालिया प्रदर्शन को लेकर कहा, “टीम अच्छी है। टीम के सभी खिलाड़ी भी अच्छे हैं। लेकिन इस बार कंट्रोल सिस्मट थोड़ा बिगड़ा हुआ है। टीम रोमांचक क्षणों में खुद को कंट्रोल नहीं कर पाती है। पिछले मैच में भी हमारे साथ ऐसा ही हुआ लेकिन प्रदीन ने हमें बचा लिया।”

दीपक ने पटना पाइटेस में कप्तान प्रदीप नरवाल की भूमिका पर कहा, “उनके प्रदर्शन पर जितना भी बोलूं कम ही होगा। सबको पता है वह किस स्तर के खिलाड़ी हैं और टीम में किस तरह अपनी भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन जीत सिर्फ एक खिलाड़ी से नहीं मिलती है। इसके लिए सबको अपना सामूहिक योगदान देना होगा।”

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