संदीप पौराणिक
संदीप पौराणिक
भोपाल, 24 फरवरी (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के जावरा कस्बे स्थित कुंदन कुटीर आश्रय गृह में बालिकाओं के प्रताड़ित किए जाने का मामला सामने आने के बाद सरकार भले ही हरकत में नजर आई हो लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग अब भी इसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है, यही कारण है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के ऐलान के 20 दिन बाद भी विभाग आश्रय गृहों का सोशल ऑडिट जल्द शुरू करने की बात कह रहा है।
बीते पिछले कुछ माह में राज्य के एक नहीं बल्कि कई स्थानों के आश्रय गृहों में गड़बड़ियां सामने आई हैं। भोपाल, ग्वालियर के बाद रतलाम के मामले ने सबकी आंखें खोल दी हैं। इस आश्रय गृह में 310 बालिकाएं आई और उनमें से सिर्फ 30 का ही ब्योरा मिला है। इस मामले की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) कर रहा है।
जावरा बालिका आश्रय गृह का मामला सामने आने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सख्त तेवर दिखाए और कहा था कि पूर्व की सरकार के समय निजी एवं एनजीओ द्वारा संचालित बालिका गृह व अन्य संस्थाओं की मनमर्जी को खत्म किया जाएगा और सभी संस्थाओं का सोशल ऑडिट होगा। इनमें रह रही बेटियों से नियमित संवाद की व्यवस्था कायम की जाएगी ताकि समय रहते दरिंदगी और हैवानियत की घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाई जा सके।
मुख्यमंत्री के सोशल ऑडिट के निर्देशों पर अब तक अमल शुरू नहीं हुआ है। महिला बाल विकास विभाग के आयुक्त एम.बी. ओझा ने आईएएनएस से कहा, “राज्य में पहले कभी भी सोशल ऑडिट नहीं हुआ है, राज्य में आश्रय गृहों के सोशल ऑडिट कराने की प्रक्रिया चल रह रही है। यह जल्दी शुरू हो जाएगा।”
बच्चों के हितों के संरक्षण के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत दुबे का कहना है कि आश्रय गृहों के सोशल ऑडिट का प्रावधान तो चार साल पहले ही हो चुका था लेकिन सोशल ऑडिट शुरू होना तो दूर अब तक उसका मूल ढांचा ही नहीं बना। यह सरकारी मशीनरी के काम के तौर तरीके को जाहिर करता है। इतना ही नहीं आश्रय गृहों के निरीक्षण के लिए जो आवश्यक पहल की जानी चाहिए वह भी नहीं हुई है। सवाल उठता है कि क्या मुख्यमंत्री या सरकार के बदलने के बाद काम में बदलाव आएगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य में 113 आश्रय गृह हैं। यह आश्रय गृह सरकारी और निजी स्तर पर संचालित है। बाल गृहों की संख्या 52 है। इनमें 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों को रखा जाता है। लड़के और लड़कियों के अलग-अलग आश्रय गृह हैं। खुले आश्रय गृह की संख्या 9 है। यह ऐसे आश्रय गृह हैं, जहां बच्चों का कोई सहारा न होने पर उसे तात्कालिक आवास सहायता व आश्रय मिलता है। यहां बच्चे दिन और रात में रुक सकते हैं।
वहीं छह साल तक के बच्चों के लिए शिशु गृह है। इनकी संख्या राज्य में 31 है। शिशु गृह की श्रेणी में विशेष दत्तक ग्रहण एजेंसी (स) को भी रखा जा सकता है। यह वह स्थान है, जहां से बच्चों को गोद दिया जाता है।
इसी तरह विभिन्न मामलों के विवादित बच्चों को संप्रेक्षण गृह में रखा जाता है। जब मामले विचाराधीन हो तब किशोर न्याय बोर्ड के आदेश पर किशोर को अस्थायी तौर पर संप्रेक्षण गृह में रखा जाता है। संप्रेक्षण गृह में बालकों को उनकी मानसिक व शारीरिक अवस्था के आाार पर सात से 12 वर्ष , 12 से 16 वर्ष और 16 से 18 वर्ष के आयु समूह में बांटा जाता है।
इसके अलावा राज्य में तीन विशेष गृह बनाए गए हैं। इन गृहों में उन बच्चों को रखा जाता है, जो आपराधिक मामलों में लिप्त रहने के बाद समाज में वापस लौटना चाहते हैं। इनकी आयु तीन से 18 वर्ष होती है।
बच्चों के पुनर्वास के लिए पश्चातवर्ती गृह भी बनाए गए हैं। यह वह गृह हैं, जहां बाल गृह, विशेष गृह या संप्रेक्षण गृहों से बाहर आ चुके बच्चों को व्यावसायिक रूप से सशक्त बनाने के प्रयास होता है। यहां तीन वर्ष से 21 वर्ष की आयु तक के बच्चे रह सकते हैं।
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