नई दिल्ली– केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट (2025-26) में खुलासा हुआ है कि सर्वाधिक डाय-अमोनियम फॉस्फेट की खपत वाले देश के शीर्ष 100 जिलों में मध्य प्रदेश के 11 जिले शामिल हैं। यानी रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में मध्य प्रदेश देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया है।आधुनिक विकास के तमाम-ओ-तमाम खटरागों की तरह हमारे यहां खेती भी दिनों-दिन बदहाल होती जा रही है। कमाल यह है कि इस बदहाली को समाज, सरकार और सेठ की हैसियत के नागरिक विकास मानते और जपते रहते हैं। सवाल यह है कि क्या मौजूदा तौर-तरीकों से खेती की जाती रही तो वह कब तक बच पाएगी? और क्या यह संकट इंसानों के वजूद को ही प्रभावित नहीं करेगा?
देश की उपजाऊ मिट्टी में रसायनों का जहर घुल रहा है। खेत बंजर होते जा रहे हैं। ‘केंद्रीय कृषि मंत्रालय’ की ताज़ा रिपोर्ट (2025-26) में खुलासा हुआ है कि सर्वाधिक ‘डीएपी’ (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की खपत वाले देश के शीर्ष 100 जिलों में मध्य प्रदेश के 11 जिले शामिल हैं। यानी रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में मध्य प्रदेश देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया है।
इस सूची में मध्य प्रदेश के अधिकांश जिले वे हैं, जहां ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती होती है। विशेषकर नर्मदा किनारे के जिलों में ‘डीएपी’ और ‘यूरिया’ की खपत सबसे अधिक है। नर्मदा क्षेत्रों में होशंगाबाद (नर्मदापुरम), सीहोर, हरदा और जबलपुर में मूंग की खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का भारी उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में ‘नियंत्रक महालेखा परीक्षक’ (कैग) की रिपोर्ट बताती है कि 91 प्रतिशत किसानों को कृषि विभाग से उर्वरक संबंधी प्रशिक्षण या सलाह नहीं मिली।
‘आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25’ के अनुसार, कृषि और संबद्ध क्षेत्र ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) में लगभग 16 प्रतिशत का योगदान करता है और 46 फीसदी से अधिक आबादी के लिए भरण-पोषण एवं आजीविका उपलब्ध करवाता है। इसके लिए प्रतिवर्ष लगभग 601 लाख मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरक और 55 से 60,000 टन रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। भारत दुनिया में उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। ‘केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय’ की रिपोर्ट के अनुसार 1950-51 में भारतीय किसान मात्र सात लाख टन रासायनिक उर्वरक का उपयोग करता था।
उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी कच्चा माल आयात करना पड़ता है। ‘यूरिया’ के कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ओमान, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आता है। ‘डीएपी’ के मामले में अकेले सऊदी अरब की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ज्यादा है। ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ और प्रमुख जलमार्गों में व्यवधान के कारण ‘यूरिया’ और ‘डीएपी’ बनाने के लिए जरूरी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
उर्वरक आयात और प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों के कारण भारत सरकार पर सब्सिडी का बोझ तेजी से बढ़ा है। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2026 में कुल उर्वरक सब्सिडी 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है। दूसरी तरफ, कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से न सिर्फ फसल प्रभावित होती है, बल्कि जमीन की सेहत और फसल खाने वाले इंसानों और जानवरों की सेहत के साथ ही पर्यावरण पर भी बेहद प्रतिकूल असर पड़ता है।
अनाज और सब्जियों के माध्यम से लोगों के शरीर में पहुंचे जहर से तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट’ (सीएसई) की रिपोर्ट के मुताबिक रासायनिक खाद के बढ़ते इस्तेमाल के कारण देश की 30 फीसदी जमीन बंजर होने की कगार पर है। यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल ने नाइट्रोजन चक्र को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ‘नाइट्रस-ऑक्साइड’ एक ‘ग्रीनहाउस गैस’ है, जो जलवायु परिवर्तन के संकट को बढाने में बड़ा योगदान देती है। कीटनाशकों के प्रयोग से भूजल और पर्यावरण में जहर घुल रहा है।
भारतीय कृषि के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है – 1967-68 में शुरू हुई ‘हरित क्रांति।’ इसकी मुख्य बात थी, सिंचाई की गारंटी के साथ अधिक फसल वाले बीजों, अधिक उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल। ‘हरित क्रांति’ के कारण देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो हो पाया, लेकिन 1980 के दशक से ‘हरित क्रांति’ भी संकट में फंस गई। खेती में बढ़ती लागत के कारण किसान कर्ज के दलदल में फंसकर आत्महत्या करने को विवश हो गए। यह स्थिति केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि आगामी पीढ़ियों के अस्तित्व का संकट है।
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