हरिद्वार, 18 अप्रैल (आईएएनएस)। संस्कृति का रक्षण करना हो तो संवेदना का रक्षण जरुरी है। संवेदना की वाणी संस्कृत है। यह कहना है गायत्री परिवार के प्रमुख डा. प्रणव पण्ड्या का। वे शनिवार को देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में प्रारंभ हुए प्रथम अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि आज जो कुछ समाज में घटित हो रहा है उसका बड़ा कारण संस्कृत की उपेक्षा से हुआ है। वेद, उपनिषद, आदि ज्ञानजन पुस्तकें देववाणी में निहित है और आज की युवा पीढ़ी इस भाषा से अनभिज्ञ है। ऐसे में उनसे संस्कृति की रक्षण की अपेक्षा कैसे रखें? आप सभी इस ओर सोच रहे हैं वो प्रशंसनीय है।
सेमिनार के मुख्य अतिथि देवभूमि उत्तराखंड के मुख्य सचिव एन. रविशंकर ने कहा कि संस्कृति का सारांश वसुधैव कुटुंबकम है। ललित कला अकादमी के अध्यक्ष प्रो केके चक्रवर्ती ने 21वीं सदी में संस्कृत की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उत्तराखंड संस्कृत विवि के कुलपति प्रो महावीर अग्रवाल ने संस्कृत को विश्व की प्रतिष्ठा कहा। इस अवसर पर कुलपति शरद पारधी, प्रति कुलपति डॉ चिन्मय पंड्या सहित अनेक संस्कृत विद्वानों ने अपने विचार रखे।
दो दिवसीय इस सेमिनार में 200 से अधिक संस्कृत शोधार्थी अपने शोधपत्र पांच वर्गो में पढ़ेंगे। इस अवसर पर संगोष्ठी की ई-स्मारिका का विमोचन देसंविवि के कुलाधिपति डा. पण्ड्या, मुख्य सचिव एन रविशंकर सहित अतिथियों ने की।
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