बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती ने भी पश्चिमी उप्र को अलग चार प्रदेशों में बांटने की सिफारिश की थी। राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव जयंत चौधरी ने भी अब इस मुद्दे पर मौन साध लिया है।
मायावती ने अपने मुख्यमंत्री काल में प्रदेश को चार राज्यों में विभाजन का प्रस्ताव भी विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेजा था हालांकि केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को तवज्जो नहीं दी थी। इसके बाद से ही यह मुद्दा दबा हुआ था लेकिन जब लोकसभा चुनाव की शुरुआत हुई तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा रालोद और बसपा ने जोर-शोर से उठाया।
पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी आंध्र प्रदेश का विभाजन कर पृथक तेलंगाना राज्य के गठन का स्वागत करते हुए उत्तर प्रदेश को पूर्वाचल, बुंदेलखंड, अवध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में विभाजित करने की मांग जोरदार तरीके से लोकसभा चुनावों में उठाया था। लेकिन जब लोकसभा का परिणाम आया तो प्रदेश में इस दोनों दलों का खाता ही नहीं खुला। इससे हरित प्रदेश के मुद्दे पर दोनों दलों ने चुप्पी साध ली। इस तरह हरित प्रदेश का मुद्दा ही पूरी तरह से नेपथ्य में चला गया।
मनमोहन सिंह की सरकार में केन्दीय नागरिक उड्डयन मंत्री रहे चौधरी अजित सिंह की अगुवाई वाले रालोद द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, बागपत, मुजफरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, अलीगढ़, एटा, आगरा, मुरादाबाद और बरेली समेत दो दर्जन जिलों को मिलाकर हरित प्रदेश के गठन की आवाज उठाई जा रही थी।
रालोद और बसपा के प्रत्याशी अपनी हर चुनावी सभा में हरित प्रदेश की मांग जरूर रखते थे। बसपा को यह उम्मीद थी कि पश्चिमी उप्र को अलग राज्य बनाने से प्रदेश पर अच्छा नियंत्रण रहेगा और 2013 जैसे दंगों की पुनरावृत्ति नहीं होगी। दूसरी तरफ राष्ट्रीय लोकदल तो अपनी रैलियों के दौरान क्षेत्रीय मतदाताओं की भावनाओं से जुड़े इस मुद्दे पर ही पूरी तरह से केंद्रित रहता था।
रालोद और बसपा मुखिया राज्य के चार हिस्सों में विभाजन की बात जोरदार तरीके से रखते रहे लेकिन सपा और कांग्रेस इस मुद्दे की मुखालफत करते रहे। भाजपा के अलावा अन्य पार्टियां अपने चुनाव प्रचार में इस संवेदनशील मसले पर बचती दिखीं।
बीते लोकसभा चुनाव में हरित प्रदेश के मुद्दे को लेकर लोगों को लामबंद करने की कोशिश में लंबे अर्से से जुटे रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह ने लोकसभा की अमरोहा, मेरठ और आगरा में आयोजित अपनी रैलियों में हरित प्रदेश के गठन की पुरजोर वकालत की थी।
अजित ने तर्क दिया था कि उप्र बड़ा राज्य होने के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास की दौड़ में पिछड़ रहा है। यदि अलग हरित प्रदेश बनेगा तो इस क्षेत्र का समग्र विकास होगा। अजित लगातार दावा करते हैं कि यदि हरित प्रदेश बना तो वह समृद्धतम राज्यों में होगा।
dharmpath.com dharmpath