नई दिल्ली, 7 मई (आईएएनएस)। लोकसभा में गुरुवार को किशोर न्याय (संशोधन) विधेयक पारित हो गया। इस विधेयक के साथ जघन्य अपराध करने वाले 16-18 आयुवर्ग के किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाए जाने का प्रावधान का रास्ता साफ होगा।
विपक्षी पार्टियों एवं बाल अधिकार से जुड़े विशेषज्ञों ने हालांकि इस कदम को घातक करार दिया और कहा कि सदन में पूर्ण बहुमत का सत्ता पक्ष ने उपयोग कर इसे पारित कराया।
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2014 संशोधन, मौजूदा किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की जगह लेगा। अब राज्यसभा में इस विधेयक के सोमवार को पेश होने की उम्मीद है।
नए विधेयक में छोटे, गंभीर और जघन्य अपराधों को स्पष्ट तौर पर परिभाषित और श्रेणीबद्ध किया गया है। इसके साथ ही हर श्रेणी के अपराध के लिए विभेदित प्रक्रियाओं को भी परिभाषित किया गया है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने अगस्त 2014 में लोकसभा में किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) विधेयक, 2014 पेश किया किया था।
विधेयक को एक स्थायी समिति को भेज दिया गया था, जिसने कानूनी तौर पर किशोर की उम्र 18 वर्ष रखने की सिफारिश की थी।
हालांकि, सरकार ने समिति की सिफारिशों को नजरअंदाज करते हुए, जघन्य मामलों में किशोर की उम्र घटाकर 16 साल करने का फैसला किया था।
बाल अधिकार विशेषज्ञ एवं दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून संकाय में प्रोफेसर वेद कुमारी ने कहा, “यह संशोधन न्यायोचित नहीं है। इस विधेयक के पीछे की दलील मेरी समझ से परे है। यह घातक होगा।”
वकील करुणा नंदी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है। वयस्कों के साथ जेल भेजे जाने से किशोरों पर गलत प्रभाव पड़ेगा।
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस विधेयक का विरोध किया। हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि जघन्य घटना के लिए किशोरों की उम्र घटाने से आदिवासी और जनजातीय समुदाय के किशोर इससे ज्यादा पीड़ित होंगे।
किशोर न्याय अधिनियम को संशोधित करने के लिए 16 दिसंबर 2012 के सामूहिक दुष्कर्म की वारदात के बाद ही कदम उठाए जाने लगे थे। इस वारदात में दिल्ली में एक युवती के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म किया गया था, जिसके आरोपियों में एक नाबालिग भी शामिल था।
dharmpath.com dharmpath