छत्तीसगढ़ : अबूझमाड़ में एक भी किसान नहीं!

नारायणपुर के मंडी सचिव सुरेश सिंह की मानें तो अबूझमाड़ में रहने वाले किसानों के नाम मंडी चुनाव के लिए बनने वाली मतदाता सूची में नहीं जोड़े जा सकते हैं। इसके लिए पटवारी की ओर से दिए गए राजस्व अभिलेख की जरूरत होती है। इसके अभाव में माड़ के लोगों को मतदाता का दर्जा नहीं मिल पाता है, इसलिए अबूझमाड़ में एक भी ‘किसान’ नहीं है।

अबूझमाड़ माओवादियों का ‘राज्य’ है। इसका वास्तविक आकार एक अबूझ पहेली है। बस्तर के जंगल से लेकर आंध्रप्रदेश, तेलंगाना के आदिलाबाद, खम्मम और पूर्वी गोदावरी जिलों, महाराष्ट्र के चंद्रपुर और गढ़चिरौली से लेकर मध्यप्रदेश के वालाधार, और ओड़िशा के मलकानगिरी तक फैला है। इस क्षेत्र का कभी सर्वेक्षण नहीं हुआ है। यहां तक की पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में मुगल सम्राट अकबर द्वारा भी इसका सर्वेक्षण नहीं कराया गया जिनके नाम भारत का पहला राजस्व सर्वेक्षण कराने का रिकार्ड है।

भारत के पहले महासर्वेक्षक एडवर्ड एवरेस्ट ने भी वर्ष 1872 से 1880 के बीच अबूझमाड़ की समस्त स्थलाकृति का ऑकलन कराने में नाकाम रहे थे। खुफिया विभाग के सूत्रों के मुताबिक, अबूझमाड़ में माओवादियों के हथियार निर्माण से लेकर छापामार प्रशिक्षण केंद्र भी शामिल है। यह माओवादी शीर्ष नेताओं के लिए सुरक्षित पनाहगार भी है। यह इलाका भारी उत्खनन वाला है।

बस्तर के भीतरी इलाके में करीब 4000 वर्ग किलोमीटर इलाके में करीब 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले अबूझमाड़ में आज भी आदिमयुगीन सभ्यता जीवित है। अबूझमाड़ के राजस्व सर्वे के लिए 2009 में राज्य सरकार ने 22 निरीक्षकों की भर्ती की थी, लेकिन एक ने भी कार्यभार नहीं सम्भाला था। इस क्षेत्र में सबसे बड़ा खौफ ‘नक्सली’ है। वैसे अबूझमाड़ में कुल 237 राजस्व गांवों का 2008 में एरियल सर्वे हुआ था।

राजस्व विभाग के सूत्रों की मानें तो 5 हजार 852 वर्ग किलोमीटर और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने, आवागमन के साधन कम होने के बावजूद नेशनल रिमोट सेसिंग एजेंसी द्वारा कुल 237 ग्रामों का हवाई सर्वेक्षण कराया गया, जिसमें नारायणपुर के 190, बीजापुर के 39, दंतेवाड़ा जिले के 8 ग्राम शामिल हैं।

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