ल्यूकेमिया इलाज के दुष्परिणाम घटाने के प्रयास में आईआईटी-मद्रास

नई दिल्ली, 7 जून (आईएएनएस)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-मद्रास के शोधकर्त्ताओं के एक दल ने एक नई प्रौद्योगिकी ईजाद की है, जिसके तहत इम्युनोटॉक्सिन्स नामक अणुओं के एक नए वर्ग का इस्तेमाल किया जाता है।

नई दिल्ली, 7 जून (आईएएनएस)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-मद्रास के शोधकर्त्ताओं के एक दल ने एक नई प्रौद्योगिकी ईजाद की है, जिसके तहत इम्युनोटॉक्सिन्स नामक अणुओं के एक नए वर्ग का इस्तेमाल किया जाता है।

आईआईटी-मद्रास के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के स्टेम सेल और आणविक जीव विज्ञान के प्रोफेसर राम एस.वर्मा ने कहा कि इमोनोटॉक्सिन्स अणुओं का एक समूह है, जो कैंसर कोशिका के आसपास मौजूद रिसेप्टर्स पर निर्भर चुनिंदा कैंसर को लक्षित करते हैं।

वर्मा ने आईएएनएस को बताया, “हम उस विशिष्ट रिसेप्टर के लिए लीजैंड्स (आयन और न्यूट्रल अणुओं का केंद्रीय धातु अणु के साथ जुड़ाव) को जानते हैं और उस चुनिंदा रिसेप्टर का लीजैंड्स टॉक्सिन अणु के साथ जुड़ता है। हमने जीव विज्ञान को समझने के लिए कई अणु भी बनाए हैं कि किस तरह से वे कैंसर का सामना करते हैं।”

ल्यूकेमिया अस्थि मज्जा को प्रभावित करता है, जो रक्त कोशिकाओं के उत्पादन का स्थान है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में असामान्य सफेद रक्त कोशिकाएं रक्तप्रवाह करती हैं।

अधिकतर कैंसर मरीजों को या तो कीमोथैरेपी या फिर रेडिएशन थैरेपी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इन दोनों ही चिकित्सा प्रक्रियाओं में बालों का झड़ना, थकावट, चोट और त्वचा संबंधी समस्याओं के दुष्परिणाम सामने आते हैं।

बाल चिकित्सा और वयस्क ल्यूकेमिया पर शोध कर रहे शोधकर्ताओं का कहना है कि बाजार में इम्यूनोटॉक्सिन के कोई दुष्परिणाम नहीं है।

पूंजी से जुड़ी हुई चिंताओं के बावजूद वर्मा को दो से तीन साल के भीतर नैदानिक परीक्षण कर लेने की उम्मीद है।

वर्मा ने कहा, “मुझे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से अधिकतर पूंजी मिली है, क्योंकि नैदानिक परीक्षण काफी महंगे हैं। मैं आश्वस्त हूं कि कंपनी के कुछ निवेशक मेरे शोध को आर्थिक मदद दे सकते हैं।”

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