वाशिंगटन, 23 जून (आईएएनएस)। कुछ देशों में विश्व बैंक की सहायता से चल रही परियोजनाओं का विरोध करने वालों का सरकार द्वारा किए जा रहे दमन को रोकने के लिए विश्व बैंक ने कुछ नहीं किया है। यह बात ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रपट में कही। रपट में ऐसे देशों में भारत को भी रखा गया है।
144 पृष्ठों की इस रपट ‘आपके अपने जोखिम पर : विश्व बैंक समूह की परियोजनाओं के विरोधियों का दमन’ में इसका विस्तृत विवरण दिया गया है कि किस प्रकार से सरकार और शक्तिशाली कंपनियों ने उन समुदायों के सदस्यों को डराया-धमकाया है और उनके खिलाफ अपराध कानूनों का दुरुपयोग किया है, जो विश्व बैंक और उसके निजी क्षेत्र के बैंक इंटरनेशनल फायनेंस कॉरपोरेशन (आईएफसी) की सहायता से चल रही परियोजनाओं से या तो विस्थापित होने वाले थे या उन्हें नुकसान होने वाला था।
मानवाधिकार संगठन ने सोमवार को जारी रपट में कहा है कि विश्व बैंक या आईएफसी एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए समुचित कदम उठाने में असफल रही, जिसमें आम आदमी खुलकर अपनी समस्या जताए या आलोचना करे और उसके दमन का डर नहीं हो।
ह्यूमन राइट्स वाच की जेसिका इवांस ने कहा, “विश्व बैंक हमेशा से कहता रहा है कि जन सहभागिता और जनता के प्रति जवाबदेही उसकी परियोजना की सफलता के लिए जरूरी है।”
उन्होंने साथ ही कहा कि दमन रोकने के लिए बैंक द्वारा कदम नहीं उठाना इन सिद्धांतों के साथ मजाक करने जैसा है।
रपट में कंबोडिया, भारत, उगांडा और उज्बेकिस्तान को उन देशों की सूची में रखा गया है, जहां विश्व बैंक की सहायता से चलने वाली परियोजना का विरोध करने वालों का दमन किया जाता है।
रपट में भारत का एक वाकया पेश किया गया है, जिसमें बताया गया है कि देश के उत्तर में एक निर्माणाधीन पनबिजली परियोजना बनाने वाली कंपनी के कर्मचारियों ने परियोजना के विरोध में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को वेश्या कहा तथा उनकी जाति का हवाला देकर उन्हें अपमानित किया और उन्हें धमकी भी दी कि यदि वे प्रदर्शन बंद नहीं करेंगे, तो उन्हें परिणाम भुगतना होगा।
रपट में कहा गया है कि विश्व बैंक की सरकार में ऊंचे पदों पर संपर्क रहता है और वह ऐसे मामलों में बेहतर माहौल बनाने के लिए सरकार पर दबाव बना सकता है।
मानवाधिकार समूह ने कहा कि बैंक हालांकि इस तरह का हस्तक्षेप करने से बचता रहा है।
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