गोरखपुर, 7 सितम्बर (आईएएनएस)। प्रतिष्ठित गीता प्रेस के अस्तित्व में आने के 92 वषों बाद पहली बार यहां मशीनें खामोश हो गई हैं। गीता प्रेस के हमेशा के लिए बंद होने के कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन प्रेस प्रबंधन कहता है कि ऐसा कभी नहीं होगा।
गोरखपुर, 7 सितम्बर (आईएएनएस)। प्रतिष्ठित गीता प्रेस के अस्तित्व में आने के 92 वषों बाद पहली बार यहां मशीनें खामोश हो गई हैं। गीता प्रेस के हमेशा के लिए बंद होने के कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन प्रेस प्रबंधन कहता है कि ऐसा कभी नहीं होगा।
इस अग्रणी प्रकाशन संस्थान के प्रबंधन से जुड़े एक अधिकारी ने आईएएनएस को बताया, “ऐतिहासिक और समृद्ध गीता प्रेस को कभी भी बंद नहीं किया जा सकता। दुनियाभर में इसके करोड़ों ग्राहक हैं। गीता प्रेस से उनकी भावनाएं जुड़ी हैं। हम किसी भी हाल में उन्हें निराश नहीं कर सकते।”
वेतन वृद्धि, आवासीय भत्ता और पिछले वर्ष दिसम्बर में हुए एक विद्रोह के कारण निकाले गए कर्मचारियों की बहाली जैसे कई मुद्दों पर प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच तलवारें खिंची हुई हैं।
20 से भी ज्यादा बैठकें और दोनों पक्षों के शुभचिंतकों के प्रयासों के बावजूद इस समस्या का कोई हल नहीं निकल पाया है।
सूत्रों ने आईएएनएस को बताया कि गीता प्रेस प्रबंधन, गोरखपुर इकाई को अन्य जगह स्थानांतरित करने पर विचार कर रहा है।
कुछ सोशल नेटवर्किं ग साइट्स पर गीता प्रेस को आर्थिक सहायता देने के निवेदन किए जा रहे हैं। अधिकारियों ने लोगों से कहा है कि समस्या आर्थिक नहीं है, यह श्रमिकों को लेकर है, इसलिए वे इसके खातों पर धनराशि न भेजें।
पिछले कुछ सप्ताहों में कल्याण पत्रिका का खाता क्रमांक एक सोशल मीडिया साइट पर आया, जिसके बाद लोगों ने धनराशि भेजने शुरू कर दिए।
प्रबंधन ने खाते को बंद कर दिया है।
गीता प्रेस के उपप्रबंधक मेघ सिंह चौहान ने समस्या के लिए कर्मचारी नेताओं के अड़ियल रुख को जिम्मेदार ठहराया है।
इसके विपरीत कर्मचारी संगठन के नेता मुनिश्वर मिश्रा ने कहा कि प्रबंधन कर्मचारियों की उचित मांगों को लेकर संवेदनशील नहीं है।
1923 में स्थापित गीता प्रेस, गोविंद भवन कार्यालय की इकाई है, जो कि सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है।
संस्थान के न्यासियों के मुताबिक, इसका मुख्य उद्देश्य गीता, रामायण उपनिषद, पुराण, प्रख्यात संतों के प्रवचन और व्यक्त्वि विकास की अन्य पुस्तकों के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिए, इन्हें कम दरों पर उपलब्ध कराना है।
इन वर्षो में संस्थान ने विभिन्न उपनिषदों और पुराणों की 58 करोड़ प्रतिलिपियों के साथ ही गीता और रामायण की करोड़ों प्रतियां प्रकाशित की हैं।
गीता प्रेस संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, तमिल, मराठी, बंगाली समेत कई भाषाओं में प्रकाशन करता है।
हिंदी में ‘कल्याण’ और अंग्रेजी में ‘कल्याण-कल्पतरु’ मासिक पत्रिकाएं हैं।
गीता प्रेस के भविष्य पर मंडरा रहे खतरे ने इसके समृद्ध इतिहास पर दाग लगा दिया है।
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