शहरी विकास विभाग के प्रमुख सचिव सदाकांत ने इस संबंध में बताया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साफ कहा है कि सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहीत करने के बजाय जिलाधिकारी किसान से जमीन खरीदें और जरूरत के हिसाब से उद्योगों को हस्तांतरित करें।
प्रमुख सचिव ने कहा कि भूमि अधिग्रहण एक जटिल कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें कई बार किसान को अपनी जमीन का उचित मूल्य नहीं मिलता। कभी-कभी यह लंबी कानूनी लड़ाई और आंदोलन की वजह बनती है। इससे बचने के लिए सरकार ने जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे जमीन को किसानों से खरीदें और जरूरत के हिसाब से उद्योगों या आवास विकास प्राधिकरणों को हस्तांतरित करें। सरकारी परियोजनाओं के मामले में जमीन को सीधे संबधित विभाग के हवाले किया जाएगा, जबकि निजी क्षेत्र की परियोजनाओं में जिलाधिकारी समन्वयक की भूमिका में होंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार भूमि का अधिग्रहण नहीं करेगी, मगर निजी उपक्रमों की सहायता के लिए वह मध्यस्थ की भूमिका निभाएगी। यह फार्मूला 326 किलामीटर लंबे आगरा लखनऊ एक्सप्रेस-वे के निर्माण में आजमाया जा चुका है। एक्सप्रेस-वे के लिए किसानों से जमीन खरीदी गई और उसे उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास प्राधिकरण को हस्तांतरित कर दिया गया।
इस प्रक्रिया में किसानों को अपनी जमीन के मौजूदा सर्किल रेट के मुकाबले चारगुने दाम मिले। इससे पहले समाजवादी पार्टी सरकार ने एक्सप्रेस-वे के निर्माण के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को आजमाया था, मगर उद्योगों द्वारा प्रोत्साहन राशि बढ़ाने की मांग आने के बाद सरकार को रणनीति में बदलाव करना पड़ा।
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