नीतीश कुमार : फिर बिहार की बागडोर संभालने की तैयारी

पटना, 8 नवंबर (आईएएनएस)। बिहार में लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले इंजीनियरिंग में स्नातक नीतीश कुमार ने सन् 1970 की शुरुआत में बिहार की राजनीति में कदम रखा था। जनता दल (युनाइटेड) के नेता नीतीश विकास व सुशासन के लिए जाने जाते हैं, जो विधानसभा चुनाव में भारी जीत के बाद एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री पद को सुशोभित करने के लिए तैयार हैं।

नीतीश कुमार द्वारा लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) व कांग्रेस के साथ गठबंधन को उनके प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मौकापरस्ती करार दिया था।

विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने लोगों को इस बात से आश्वस्त किया था कि अगर उन्हें एक बार और मौका मिला, तो वे बिहार की सेवा उसी सेवाभाव से करेंगे, जैसा उन्होंने बीते 10 वर्षो के दौरान किया।

उन्होंने भाजपा के साथ जद (यू) गठबंधन का नेतृत्व किया और साल 2005 व 2010 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की।

उनकी दूर दृष्टि व मेहनत के कारण एक समय में विकासशील राज्य विकास के लिए खबरों में आने लगा। उच्च विकास दर व बेहतर कानून-व्यवस्था से हालात में सुधार हुआ।

जद (यू) के प्रदेश अध्यक्ष व साल 1990 से नीतीश कुमार के सहयोगी वशिष्ट नारायण सिंह ने कहा, “यह उनके अंदर का टेक्नोक्रेट है, जो बिहार को विकसित बनाने के उनके प्रयास में झलकता है और नीतीश कुमार एक विकास पुरुष कहलाए। यहां तक कि उनके आलोचक भी यह स्वीकार करते हैं कि वह बिहार को बदलने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।”

नीतीश कई वर्षो तक लालू यादव के नेतृत्व में राजनीति पथ पर कदम बढ़ाते रहे, लेकिन उनकी अलग एक छवि तब बनी, जब उन्होंने साल 1990 में लालू यादव से रिश्ता तोड़कर अपनी अलग राह चुनी।

मार्च 2000 में मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल बेहद संक्षिप्त रहा। आधा दर्ज बाहुबलियों के समर्थन से मुख्यमंत्री बने नीतीश को बहुमत साबित न करने के कारण सात दिनों में ही इस्तीफा देना पड़ा था।

पांच साल बाद उनकी फिर से वापसी हुई, लेकिन इस बार उनका भाजपा के साथ गठबंधन था।

साल 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित करने के बाद नीतीश ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ लिया।

लेकिन रिश्ते तोड़ने की कीमत उन्हें लोकसभा चुनाव में चुकानी पड़ी। लोकसभा चुनाव में उन्हें मात्र दो सीटें ही मिलीं।

नीतीश कुमार ने बुरी तरह हुई इस हार की जिम्मेदारी ली और अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अपनी जगह उन्होंने महादलित नेता जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया।

बाद में इस्तीफा देने से इनकार करने पर मांझी को पार्टी से निकाल दिया गया, जिसके बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) का गठन किया और भाजपा की अगुवाई वालले राजग में शामिल हुए।

मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार बिहार के पुनर्निर्माण के लिए लोगों से वोट मांगने के लिए बिहार दौरे पर निकले।

अपने कार्यकाल के दौरान नीतीश ने 12 हजार से अधिक पुल, 66 हजार से अधिक सड़कें, लंबे समय से लंबित बुनियादी परियोजनाओं को पूरा किया, बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए तीन लाख से अधिक स्कूली शिक्षकों की नियुक्ति की और चिकित्सकों के स्वास्थ्य केंद्र में ड्यूटी को सुनिश्चित किया।

उन्होंने राजनीति से जुड़े अपराधियों का दमन किया। उन्होंने 85 हजार से अधिक अपराधियों (अधिकांश राजनीतिज्ञ) के खिलाफ त्वरित सुनवाई का आदेश दिया।

किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहे एक विधवा के बेटे ने अपने परिवार को राजनीति की चकाचौंध से हमेशा दूर रखा।

सन् 1951 में जन्मे नीतीश कुमार पहली बार सन् 1985 में विधायक चुने गए। वह सन् 1987 में युवा लोक दल के अध्यक्ष बने और दो साल बाद तत्कालीन अविभाजित जनता दल के सचिव बने।

उन्होंने पहली बार वर्ष 1989 में लोकसभा चुनाव जीता।

विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में राज्यमंत्री बने। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उन्हें रेलमंत्री के पद से नवाजा गया, लेकिन एक रेल हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे परिवहन व कृषि मंत्री बनकर दोबारा मंत्रिमंडल में लौटे।

लेकिन दिल्ली की राजनीति के दौरान उन्होंने अपने लक्ष्य पर हमेशा नजरें टिकाए रखीं, लक्ष्य बिहार का विकास करना था। उनका एजेंडा न्याय के साथ विकास रहा है।

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