अगरतला, 22 दिसम्बर (आईएएनएस)। वामपंथ शासित पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा ग्रामीण रोजगार योजना लागू करने के मामले में लगातार सातवें वर्ष देश में सभी राज्यों से आगे रहा।
अगरतला, 22 दिसम्बर (आईएएनएस)। वामपंथ शासित पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा ग्रामीण रोजगार योजना लागू करने के मामले में लगातार सातवें वर्ष देश में सभी राज्यों से आगे रहा।
उल्लेखनीय है कि ग्रामीण रोजगार योजना के तहत त्रिपुरा ने वित्त वर्ष 2015-16 में प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वर्ष में औसतन 68 दिनों का रोजगार प्रदान किया, जबकि पूरे देश का औसत मात्र 36 दिन प्रतिवर्ष ही है।
राज्य के एक मंत्री ने बताया कि यदि केंद्र से आवंटित पूरी धनराशि मिल जाती तो 92 दिन प्रति वर्ष का लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता था।
त्रिपुरा के ग्रामीण विकास एवं वन मंत्री, नरेश जमातिया ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक रपट का हवाला देते हुए आईएएनएस को बताया, “त्रिपुरा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत औसत रोजगार मुहैया कराने में पिछले सात वर्षो से लगातार सबसे आगे है।”
वरिष्ठ आदिवासी नेता जमातिया ने कहा, “त्रिपुरा ने मौजूदा वित्त वर्ष में अब तक प्रत्येक परिवार को औसतन प्रति वर्ष 68 दिनों का रोजगार प्रदान किया है, जबकि राष्ट्रीय औसत मात्र 36 दिन प्रतिवर्ष का ही है। अगर हमें केंद्र द्वारा आवंटित पूरी राशि मिल जाती है, जो 1,500 करोड़ रुपये है, तो हम मार्च में मौजूदा वित्त वर्ष के समापन पर 92 दिन प्रतिवर्ष का औसत हासिल कर सकते हैं।”
उल्लेखनीय है कि मनरेगा योजना की शुरुआत फरवरी, 2006 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार ने की थी।
इस योजना के तहत किसी वित्त वर्ष में प्रत्येक ग्रामीण परिवार के किसी एक सदस्य को 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराना अनिवार्य है, लेकिन इस लक्ष्य को अब तक किसी भी राज्य में हासिल नहीं किया जा सका है। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिसंपत्तियों में वृद्धि करना और ग्रामीण अवसंरचना जैसे सड़कों का निर्माण है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की रपट के अनुसार, महाराष्ट्र इस सूची में 47 दिन प्रति वर्ष के औसत से दूसरे स्थान पर रहा, जबकि तमिलनाडु 44 दिन प्रति वर्ष के औसत के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
केंद्र सरकार की रपट के अनुसार, पूरे देश में मौजूद 250,472 ग्राम पंचायतों में से 40,000 पंचायतें अपने यहां किसी भी व्यक्ति को रोजगार मुहैया नहीं करा सकीं।
इन 40,000 ग्राम पंचायतों में से अधिकतर छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में स्थित हैं।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की रपट के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 में प्रति वर्ष रोजगार मुहैया कराने का राष्ट्रीय औसत 40.17 था, जबकि 2013-14 वित्त वर्ष में यह 46 दिन प्रति वर्ष था।
पिछले वर्ष मनरेगा योजना का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, वहीं 2009-2010 वित्त वर्ष में सबसे अच्छा (54 दिन प्रति वर्ष) रहा।
जमातिया ने बताया कि केंद्र सरकार ने केंद्र और राज्य सरकार द्वारा योजना के लिए राशि का आवंटन करने के लिए पुरानी इलेक्ट्रॉनिक कोष प्रबंधन प्रणाली (ई-एफएमएस) को हटाकर एक अप्रैल को बहुत ही कम समय के नोटिस पर सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) लागू कर दी।
जमातिया ने कहा, “दोनों ही प्रणालियां हालांकि पूरी तरह पारदर्शी, झंझटमुक्त और त्रुटिरहित हैं और ज्यादा कागजी कार्यवाही की भी जरूरत नहीं है। हमने नई प्रणाली का भी समर्थन किया। पीएफएमएस प्रणाली को एक सप्ताह से भी कम समय के नोटिस पर लागू कर दिया गया, जिसके कारण कुछ ब्लॉकों में मजदूरों को पारिश्रमिक का भुगतान करने में परेशानी हुई।”
उन्होंने बताया कि त्रिपुरा मनरेगा योजना के लिए काम करने वाले मजदूरों को उनके घर उनका पारिश्रमिक पहुंचाती है, जिसके लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीयकृत और क्षेत्रीय बैंकों की सेवा ली है।
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