सरकार ने सभी भारतीयों द्वारा शौचालय का इस्तेमाल किए जाने का एक लक्ष्य रखा है और इसको पूरा करने के लिए सरकार के पास अभी चार साल का वक्त है लेकिन भारत के केवल शहरी क्षेत्र में रहने वाले 37.7 करोड़ लोगों द्वारा उत्पन्न गंदे पानी का केवल 30 फीसदी हिस्सा ही सफाई संयंत्रों तक पहुंच पाता है।
सरकार ने सभी भारतीयों द्वारा शौचालय का इस्तेमाल किए जाने का एक लक्ष्य रखा है और इसको पूरा करने के लिए सरकार के पास अभी चार साल का वक्त है लेकिन भारत के केवल शहरी क्षेत्र में रहने वाले 37.7 करोड़ लोगों द्वारा उत्पन्न गंदे पानी का केवल 30 फीसदी हिस्सा ही सफाई संयंत्रों तक पहुंच पाता है।
विभिन्न आंकड़ों से किए गए इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार बाकी बचा 70 फीसदी गंदा पानी नदियों, समुद्रों, झीलों और कुओं में बहा दिया जाता है। इसके कारण देश के जल निकायों का तीन-चौथाई हिस्सा दूषित हो रहा है।
सरकार द्वारा दिसंबर 2015 को जारी आंकड़ों के अनुसार शहरी इलाकों से अनुमानित प्रति दिन 62,000 करोड़ लीटर (एमएलडी) गंदा पानी उत्पन्न होता है जबकि भारत में केवल 23,277 करोड़ लीटर (एमएलडी) या 37 प्रतिशत गंदे पानी को साफ किया जाता है।
इस आंकड़े से यह बात भी सामने आई कि भारत में सूचीबद्ध किए गए 816 नगर निगम के सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) में से केवल 522 संयत्र ही काम करते हैं।
इन आंकड़ों से यही अर्थ निकलता है कि भारत के शहरी इलाकों में लोगों द्वारा उत्पन्न किए जाने वाले दूषित दल के 70 प्रतिशत हिस्से का उपचार नहीं होता।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी)’ पर की गई जांच की रिपोर्ट के अनुसार 79 एसटीपी काम नहीं करते जबकि 145 निमार्णाधीन और 70 प्रस्तावित हैं।
भारत में इतने साल में कोई भी सुधार नहीं हुआ है और शहर तथा कस्बे स्वयं के स्वच्छ पानी को ही दूषित करते हैं।
सुरक्षित जल और साफ-सफाई का ब्यौरा रखने वाले संगठन-वाटर एड द्वारा जारी फीकल स्लज मैनेजमेंट की रिपोर्ट के अनुसार, 2009 सीपीसीबी रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि भारत में ‘क्लास-1’ शहरों (एक लाख से अधिक जनसंख्या) से और ‘क्लास-2’ कस्बों से उत्पन्न दूषित जल 38,255 एमएलडी अनुमानित है, जिसमें से केवल 38,255 एमएलडी (30 प्रतिशत) का ही उपचार हो पाता है।
अनुपचारित दूषित जल को सीधे तौर पर जल निकायों में छोड़ दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इससे करीब 80 प्रतिशत जल निकाय दूषित हो सकते हैं।
सीपीसीबी की रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा उपचार क्षमता का रखरखाव अंकित मूल्य के नीचे है।
घरों से निकलने वाला दूषित जल का 80 प्रतिशत का 70 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय जल निकायों में बहाया जाता है।
भारत में कार्य करने वाले 522 एसटीपी में से 86 एसटीपी पंजाब में है, जिसमें से केवल 38 एसटीपी कार्य करते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में 62, महाराष्ट्र में 60 और कर्नाटक में 44 एसटीपी हैं।
भारत के शहरी इलाकों में करीब 1.7 करोड़ घरों में साफ-सफाई सुविधा की कमी है। एफएसएम की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 1.47 करोड़ घरों में शौचालयों की सुविधा है।
लोकसभा में सात दिसंबर, 2015 में दी गई प्रतिक्रिया के अनुसार, भारत के करीब 48.4 प्रतिशत (8.79 करोड़ घरों) ग्रामीण घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है।
शहरी इलाकों में केवल 32.7 प्रतिशत घरों में ही शौचालय की सुविधा है, जबकि 3 करोड़ घरों में सेप्टिक टैंक होने के बावजूद दूषित पानी के उपचार का स्पष्ट विधि नहीं है।
भारत में लोगों का खुले में शौच करना सरकार के लिए अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर एक बहुत बड़ी चुनौती है।
शहरी इलाकों की आबादी का करीब 12.6 प्रतिशत हिस्सा खुले में शौच करता है, जबकि झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाली आबादी का 18.9 प्रतिशत हिस्ता खुले में शौच के लिए जाता है।
नेशनल सेंपल सर्वे 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा लोकसभा को दी गई प्रतिक्रिया में बताया गया कि भारत में करीब 1.7 प्रतिशत घरों के लोग शौचालय होने के बावजूद शौच के लिए खुले मैदान में जाते हैं।
लोकसभा में सात मई, 2015 को जारी आंकड़े के अनुसार, ग्रामीण आबादी का 55 प्रतिशत हिस्सा खुले में शौच के लिए जाता है। इस सूची में ओडिशा शीर्ष पर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया की आबादी का लगभग 68 प्रतिशत स्वच्छता हेतु दी गई सुविधाओं का उपयोग करता है। हालांकि, विश्व में करीब 2.4 अरब लोगों के पास बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं नहीं हैं।
सरकार की 2015-2016 तक ग्रामीण इलाकों में 25 लाख घरों में शौचालय बनाने की योजना है, जिसमें से 882,905 का निर्माण दिसंबर, 2015 में हो गया है।
सरकार द्वारा शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान के तहत अब तक 100,000 समुदायों में से 32,014 समुदायों और सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण हो चुका है।
dharmpath.com dharmpath