आतंकवाद के खिलाफ असफलता के लिए सभ्यता संघर्ष की सोच बेतुकी

लेकिन, यह एक बेदम सोच है।

बहुसभ्यताओं का अस्तित्व में होना एक ऐसी बात है, जिस पर दुनिया को गर्व होना चाहिए। सभ्यताओं के बीच के आदान-प्रदान ने महान कलाओं को जन्म दिया है। ईसाई धर्म के साथ-साथ इस्लाम के प्रभाव में बने यूरोप के कई शहर भिन्न-भिन्न सभ्यताओं के बीच के सामंजस्य की जिंदा मिसाल हैं।

सभ्यताओं के बीच फर्क रहा है और हमेशा रहेगा। लेकिन, इसके ‘संघर्ष’ की थ्योरी पहली नजर में निराशावादी और दूसरी नजर में अन्य सभ्यताओं के प्रति शत्रुतापूर्ण लगती है।

इसके साथ ही ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ पर जोर देने का मकसद पश्चिमी जगत की आतंकवाद रोधी असफलताओं की मूल वजहों पर पर्दा डालना भी है।

अमेरिका द्वारा इराक में सैन्य दखलंदाजी और मध्य पूर्व में आतंकवाद से लड़ने में इसके दोहरे मानदंडों ने सामाजिक उथल-पुथल, गुटीय विवाद, खूनी सांप्रदायिक संघर्ष, अभूतपूर्व शरणार्थी समस्या और बेलगाम आतंकवाद को भड़का दिया है।

इसी के साथ विकास की कमी और युवाओं के बीच फैली गहरी निराशा ने चरमपंथियों को अपने संगठनों में लोगों की भर्ती करने का मौका दे दिया।

आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरी है कि युद्ध प्रभावित देशों की अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकी जाए और उन्हें अपने पैरों पर फिर से खड़े होने का मौका दिया जाए।

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