नई दिल्ली, 26 फरवरी (आईएएनएस)। केंद्र सरकार की ओर से शुक्रवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में इक्कीसवीं सदी के लिए राजकोषीय क्षमता का खाका रखते हुए निजी करदाताओं का आधार बढ़ाने की बात कही गई है। सर्वेक्षण के अनुसार, 1980 के मध्य के बाद से अधिक संख्या में कर चुकाए जाने के बावजूद करीबन 85 प्रतिशत अर्थव्यवस्था कर दायरे से बाहर है।
केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 पेश किया। इसमें प्रस्तावित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को आधुनिक वैश्विक कर इतिहास में सुधार का असाधारण उपाय बताया गया है। राजनीतिक सहमति के बाद संविधान संशोधन के लिए लंबित जीएसटी केंद्र, 28 राज्यों और सात केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा।
समीक्षा में कहा गया है कि अनुमानित दो से 25 लाख उत्पाद शुल्क और सेवा कर देने वालों को प्रभावित करने वाले जीएसटी से भारतीय कर प्रणाली में आश्चर्यजनक बदलाव आएगा।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि कमाने वालों में से केवल 5.5 प्रतिशत कर दायरे में हैं।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि करदाताओं के करीब चार प्रतिशत और मतदाताओं के अनुपात को देखें तो यह अनुपात अनुमानित 23 प्रतिशत तक बढ़ना चाहिए। इसमें कहा गया है कि कर का भुगतान करना और राजनीतिक भागीदारी नागरिकों की दो महत्वपूर्ण जवाबदेह प्रक्रियाएं हैं। कर भरने और मतदान में अंतर के परिणाम विरोधाभासी हैं, जैसे देश में अकाल से निपटा जा सकता है, जबकि कुपोषण अभी भी चुनौती है।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, लेकिन महिलाओं के लिए सामान्य सुरक्षा मुहैया कराना कठिन है। प्रभावी देश बाढ़ और सुनामी में त्वरित कार्रवाई करता है, जबकि पानी की समस्या और बिजली के मीटर लगाना अधिक बड़ी चुनौती हैं।
सर्वेक्षण में सुझाया गया है कि राजकोषीय क्षमता बढ़ाने की ओर कदम के रूप में कर आधार बढ़ाने के लिए सरल तरीका छूट की सीमा बढ़ाना नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के बाद के आंकड़ों के अध्ययन के बाद कहा गया है कि आय वृद्धि से अधिक तेजी से छूट की सीमा बढ़ाई गई है, जिसके परिणामस्वरूप औसत आय और अधिकतम सीमा के बीच अंतर बढ़ा है।
सर्वेक्षण में बताया गया है कि किसी प्रकार के प्रत्यक्ष कराधान के जरिए अधिक से अधिक लोगों को कर के दायरे में लाने से भारतीय लोकतंत्र के सपने साकार करने में मदद मिलेगी।
सर्वेक्षण में कॉरपोरेट कर 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने का वादा दोहराया गया है, जबकि चरणबद्ध तरीके से कर छूट समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया है। इसमें संपन्न व्यक्तियों की आय के स्रोत पर ध्यान दिए बिना उनके वास्ते तर्कसंगत कराधान के लिए भी कहा गया है।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि राजकोषीय मजबूती का एक विकल्प समृद्ध वर्गो को लगभग एक लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी राशि कम कर इससे गरीबों को बेहतर सब्सिडी का लक्ष्य निर्धारित करना है।
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