टीम को सृजनात्मक बना सकता है आत्मविश्वासी बॉस!

न्यूयॉर्क, 1 मार्च (आईएएनएस)। सफल और सृजनात्मक टीम प्रमुख बनने के लिए आत्मविश्वास ही कुंजी है और इससे टीम के अधीनस्थ कर्मचारियों का प्रदर्शन भी बेहतर हो सकता है। यह बात एक शोध में सामने आई है।

अध्ययन में आधुनिक कार्यालयों में जाकर काम करने वाली टीमों का निरीक्षण किया गया।

सैन एंटोनियो की टेक्सास यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डिना कारासिकोव के मुताबिक, “जब टीम प्रमुख इस बात को लेकर आत्मविश्वास महसूस करते हैं कि वह सृजनात्मक निर्माण कर पाएंगे तो उनके सहयोगी भी और अधिक सृजनात्मक हो जाते हैं।”

आमतौर पर टीम प्रमुख यदि सृजनात्मक होते हैं तो उन्हें अपने विचारों के संप्रेषण का अनुभव होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं। इतना ही नहीं टीम प्रमुखों को वरिष्ठ प्रबंधन से पहचान मिलने पर उनका अपनी सृजनात्मकता पर विश्वास और अधिक बढ़ता है।

लेकिन, अध्ययन में नेतृत्व विशेषज्ञ कारासिकोव को सबसे अधिक हैरान इस बात ने किया कि टीम प्रमुख की सृजनात्मकता और आत्मविश्वास संक्रामक होता है।

कारासिकोव ने कहा, “इसका एक कारक सकारात्मक सोच की ताकत है। टीम प्रमुख केवल अपना उदाहरण रखकर अपने अधीनस्थों में आत्मविश्वास और सृजनात्मकता भर सकते हैं।”

शोध में यह भी सामने आया कि अप्रभावी और अलोचनात्मक प्रमुख अन्य लोगों की मौजूदगी में अपने अधीनस्थों का अपमान करके, पक्षपात करके और अधीनस्थों के काम के लिए उन्हें पूरा श्रेय न देकर उनके लिए तनावपूर्ण परिस्थति पैदा करते हैं।

शोधकर्ता के मुताबिक, “जब आप तनावपूर्ण महसूस करते हैं, तब आप असहाय महसूस करते हैं और आपकी सृजनात्मकता और उत्पादकता घटती है।”

उन्होंने कहा, “कई बार इसकी शुरुआत टीम प्रमुख से होती है। उदाहरण के तौर पर हो सकता है कि आप जब काम पर आएं तो आप स्पष्ट तौर पर इस बात से ही अनभिज्ञ हों कि आपको क्या करना है क्योंकि आपको अपने बॉस की विरोधाभासी अपेक्षाओं को पूरा करना होता है। इसका उपाय काम में स्पष्ट भूमिका और संवाद है।”

टीम प्रमुख और अधीनस्थों के बीच पारस्परिक संबंध की भी टीम के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका है।

कारासिकोव के मुताबिक, “जब एक आत्मविश्वासी, सृजनात्मक प्रमुख का अपने अधिनस्थों से अच्छा रिश्ता होता है तो इसका उसके अधीनस्थों की सृजन क्षमता पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।”

अध्ययन पत्रिका ‘ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर एंड ह्यूमन डिसिजन प्रोसेसिस’ में प्रकाशित हुआ है।

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