लंदन, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। नेपाल मेंसन् 400 से 650 के बीच मुस्तांग क्षेत्र से मिले वस्त्र अवशेषों और उसके रंगों के विश्लेषण से पता चला है कि पहले की सोच के विपरीत रेशम मार्ग दक्षिण में भी फै ला था। यह बात शोधकर्ताओं ने कही है।
यूनेस्को के अनुसार, रेशम मार्ग भूमि और समुद्र दोनों के पार जाता था। इस मार्ग से दुनिया भर में लोगों के बीच रेशम के अलावा अन्य सामानों के भी विनिमय होते थे।
नेपाल के ऊपरी इलाके में स्थित सैमजोंग मकबरा परिसर से मिले वस्त्रों के अवशेषों के विश्लेषण से शोधकर्ताओं को पता चला है कि ये चीन और भारत से आयातित थे।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय मेंपुरातत्व शोध से संबंधित मैकडोनल्ड संस्थान की शोधकर्ता मार्गरिटा ग्लेबा ने कहा, “नेपाल के मुस्तांग क्षेत्र में रेशम उत्पादन के कोई सबूत नहीं मिले हैं। इसलिए अवशेषों के आधार पर कहा सकता है कि यह क्षेत्र रेशम मार्ग पर स्थित था।”
ग्लेबा ने बताया कि आंकड़ों से पता चलता है कि दूरस्थ और अलग-थलग होने के बावजूद मुस्तांग छोटा होते हुए भी एक समय बड़े नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र था।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी पुरातात्विक अनुसंधान(एसटीएआर) की पत्रिका में छपे लेख के मुताबिक, ऊंचाई पर स्थित सैमजोंग मकबरा परिसर की शुष्क जलवायु के चलते जैविक अवशेषों के संरक्षण में मदद मिली होगी।
इस क्षेत्र में ऊनी कपड़ा भी मिला, जिससे तांबा, कांच, मोती और कपड़े गुथे हुए थे। यह एक वयस्क के ताबूत के पास से सोना, चांदी युक्त अंत्येष्टि के मुखौटा के साथ मिला। मुखौटा के किनारों पर छोटे-छोटे छिद्र बने हैं, जो संकेत देते हैं कि इसे कपड़े के साथ सिला गया था। संभवत: इसका उपयोग सजावट के लिए किया जाता था।
ग्लेबा ने कहा, “इन वस्त्रों को देख कर समझा जा सकता है कि स्थानीय सांस्कृतिक और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से नई वस्त्र प्रौद्योगिकी विकसित की गई।”
इन वस्त्र अवशेषों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि बहुत कम ही अवशेष हैं, जो समकालीन नेपाल के हैं।
सैमजोंग मकबरा परिसर की खुदाई अमेरिका के कैलिफोर्निया मर्सीड विश्वविद्यालय के मार्क एल्डेनडर्फर ने कराई थी।
वस्त्र अवशेषों के रंगों का विश्लेषण ब्रसेल्स स्थित सांस्कृतिक धरोहर के लिए रॉयल संस्थान की इना वानडेन बर्घे ने किया।
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