भोपाल, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। प्रतिभा किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं होती, बशर्ते उन्हें सुविधाएं और सही मार्गदर्शन मिल जाए। यह साबित कर दिया है, मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति (आदिवासी) वर्ग के 210 छात्रों ने।
भोपाल, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। प्रतिभा किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं होती, बशर्ते उन्हें सुविधाएं और सही मार्गदर्शन मिल जाए। यह साबित कर दिया है, मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति (आदिवासी) वर्ग के 210 छात्रों ने।
ये छात्र देश के प्रमुख अभियांत्रिकी संस्थाओं में दाखिले के लिए आयोजित की जाने वाली जेईई परीक्षा में सफल रहे हैं। ये सभी छात्र सरकारी और आदिम जाति कल्याण विभाग के स्कूलों के हैं।
राज्य के आदिवासी बच्चों की प्रतिभा को निखारने और उन्हें देश की सबसे प्रतिष्ठापूर्ण परीक्षा जेईई के लिए लगभग तीन वर्ष पूर्व आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा कार्ययोजना बनाई गई थी। इस कोशिश के नतीजे अब सामने आने लगे हैं।
बीते वर्ष जहां 130 बच्चे जेईई परीक्षा में सफल रहे थे, वहीं इस बार यह आंकड़ा 210 के पार पहुंच गया है।
आदिमजाति कल्याण विभाग के आयुक्त शोभित जैन ने आईएएनएस को बताया कि हाइयर सेकेंडरी परीक्षा के बाद विभाग ने अनुसूचित जनजाति बच्चों को जेईई की परीक्षा के लिए प्रशिक्षण (कोचिंग) देना शुरू किया। इसके लिए बच्चों को स्कूलों के विभागीय छात्रावासों में रहने, खाने की व्यवस्था की गई। छात्रों को प्रशिक्षण देने के लिए विशेषज्ञों की मदद ली गई।
जैन ने बताया कि कोचिंग के दौरान इस वर्ग के बच्चों की पाठ्यक्रम संबंधी समस्याओं का निदान किया गया और विशेषज्ञों के सहयोग से पाठ्यक्रम को कुछ इस तरह तैयार किया गया जो बच्चों की समझ के अनुकूल व अनुरूप था। इस वर्ग के बच्चों का मानसिक स्तर और प्रतिभा अन्य वर्ग के बच्चों से कम नहीं है, जरूरत है उनकी समझ के मुताबिक प्रशिक्षण दिए जाने की।
विभाग के अधिकारियों ने इस बात को गंभीरता से लिया और जरूरत को ध्यान में रखकर विषय विशेषज्ञों की मदद ली, प्रशिक्षण दिया गया, जिसके चलते 277 बच्चे जेईई में सफल रहे हैं। इनमें 210 अनुसूचित जनजाति के बच्चों के अलावा अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग के भी हैं।
उन्होंने बताया कि 22 दिन बाद जेईई एडवांस की परीक्षा होने वाली है। इस परीक्षा में भी ज्यादा से ज्यादा बच्चे सफल हों, इस दिशा में कार्ययोजना बनाई जा रही है।
ज्ञात हो कि जेईई में सफल छात्र ही जेईई एडवांस मे हिस्सा ले सकते हैं। जेईई एडवांस में सफल होने पर अखिल भारतीय प्रौद्योगिकी (आईआईटी) संस्थानों में प्रवेश मिलता है, जबकि जेईई के छात्र एनआईटी और सरकारल इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला पाते हैं।
पिछले दिनों जेईई के नतीजे जो नतीजे आए हैं, इसमें राज्य के विभिन्न आदिवासी जिलों से चयनित छात्रों की संख्या बदलाव का संदेश दे रही है। जिन छात्रों का चयन हुआ है, उनमें से बड़वानी से 26, झाबुआ से 32, खरगोन से 25, बैतूल से 31, धार से 24, मंडला से 42, छिंदवाड़ा से 12 और खंडवा से चार, डिंडोरी से छह छात्र हैं।
अतिरिक्त आयुक्त आर.एस. परिहार बताते हैं कि तीन वर्ष पूर्व विभाग के आयुक्त रहे उमाकांत उमराव ने आदिवासी बच्चों की प्रतिभा को देखते हुए जेईई प्रतियोगी परीक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण दिए जाने की योजना बनाई थी, उसी कोशिश का नतीजा है कि इस बार राज्य के आदिवासी वर्ग के 210 से अधिक बच्चे परीक्षा में सफल रहे हैं।
झाबुआ के जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अनुराग चौधरी ने आईएएनएस से कहा कि पूर्व में इस आदिवासी बहुल जिले के अधिकांश बच्चे हाइयर सेकेंडरी परीक्षा कला, गृहकला जैसे विषय से उत्तीर्ण करते थे और अपने जीवकोपार्जन के काम में लग जाते थे, मगर इस वर्ग के छात्रों को गणित व विज्ञान जैसे विषय को लेने के लिए प्रेरित किया गया।
इस वर्ग के बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है, यह बात जेईई के परीक्षा नतीजों से साबित हो गई है। यहां कुल 153 बच्चों को प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें से 32 जेईई परीक्षा में सफल हुए हैं।
राज्य में आदिवासी वर्ग के इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का जेईई परीक्षा में सफल होना इस बात का संकेत है कि इस वर्ग के बच्चों को नेकनीयत से प्रशिक्षण और सुविधाएं मुहैया कराई जाएं तो सफलता उनसे दूर नहीं रहेगी। बशर्ते सरकारी कोशिश कागजों से निकलकर जमीनी धरातल पर आए।
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