विशेषज्ञों का कहना है कि नार्वे के प्रशासन को इस क्रम में सांस्कृतिक भिन्नता को ध्यान में रखते हुए इसमें मूलभूत परिवर्तन लाना चाहिए।
‘बार्नेवेर्नेट’ के नाम से जानी जाने वाली देश की बाल संरक्षण सेवा के समर्थकों का जहां मानना है कि यह बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए है, वहीं अन्य का कहना है कि बच्चों को उनके जैविक माता-पिता से जबरन अलग करना वास्तव में परिवार के सदस्यों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
नॉर्वे में स्थानीय अल्पसंख्यक परिवारों के लिए काम करने वाली मनोवैज्ञानिक जूडिथ वैन डेर वीली के अनुसार, यहां रहने वाले प्रवासी अभिभावकों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती होती है कि वे ‘बार्नेवेर्नेट’ के संदर्भ में अपनी बच्चे के लालन-पालन की अपनी योग्यता को ठीक तरह से दर्शाएं।
उन्होंने समाचार एजेंसी को बताया, “बार्नेवेर्नेट से प्रवासी अभिभावक बहुत डरते हैं और यह डर इतना बड़ा है कि लोग जरूरत के वक्त मदद मांगने से भी हिचकिचाते हैं। अपने बच्चों को खोने के डर से कई बार वे उन्हें स्वदेश भी भेज देते हैं।”
नार्वे डायरेक्टोरेट फॉर चिल्ड्रन, यूथ एंड फैमिली एफेयर्स (बीयूएफडीआईआर) की निदेशक मैरी ट्रोमाल्ड ने समाचार पत्र ‘एफेनपोस्ट’ से कहा कि बार्नेवेर्नेट एक उच्च जोखिम भरा कार्य कर रहा है। दूसरों की संस्कृति को समझे बिना विदेशों के आए परिवारों में दखल के प्रतिकूल परिणाम सामने आ सकते हैं।
उन्होंने बताया कि साल 2014 में बार्नेवेर्नेट ने 1,665 बच्चों को उनके अभिभावकों से दूर कर दिया था, जिनमें 424 बच्चे प्रवासी अभिभावकों के थे।
वहीं नार्वे के मानवाधिकार अधिवक्ता ग्रो हिलस्टैड थून का कहना है कि प्रवासी अभिभावकों को नार्वे के कानून समझने के लिए वक्त देना चाहिए कि यहां किसी भी तरह का शारीरिक दंड प्रतिबंधित है। उन्हें बच्चों को मारे-पीटे बिना उनके पालन-पोषण के बारे में जानना चाहिए।
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